आज हमारा सीरवी समाज, कई दशकों से तमिलनाडु की इस पावन भूमि को अपनी कर्मभूमि मानकर, यहां के लोगों के साथ सौहार्दपूर्ण और सहयोग की भावना से निवास कर रहा है। हमने इस भूमि को अपनी मातृभूमि के समान स्नेह दिया है और यहां के सांस्कृतिक ताने-बाने के साथ स्वयं को आत्मसात किया है। किंतु, समय के साथ कुछ ऐसी समस्याएं हमारे समक्ष उभर रही हैं, जिन पर तमिलनाडु सीरवी महासभा को गहन विचार-विमर्श करने की आवश्यकता है। हमारी सबसे बड़ी चिंता हमारे बंधुओं के अंतिम संस्कार से जुड़ी है। जब हमारे समाज के किसी प्रियजन का निधन होता है और उनका देहांत इसी कर्मभूमि पर होता है, तो हम उन्हें यहीं की मिट्टी में दफनाते हैं। वर्तमान परिस्थितियों और संवेदनाओं को देखते हुए, हमें यह महसूस हो रहा है कि हमारे समाज को तमिलनाडु में एक अलग श्मशान भूमि की नितांत आवश्यकता है। जब हम किसी अंतिम यात्रा में सम्मिलित होते हैं, तो यह पीड़ादायक अहसास होता है कि हमारे समाज के लिए एक अलग, सम्मानजनक स्थान नहीं है। जिस प्रकार वर्तमान में हमें यहां के लोगों के साथ अंतिम संस्कार की क्रियाएं करनी पड़ती हैं, वह दृश्य देखकर यह विचार मन में आता है कि अग्नि संस्कार (अग्नि डाग) ही अधिक उचित और सम्मानजनक मार्ग है।
इस संदर्भ में, सीरवी समाज मनली द्वारा की गई पहल अत्यंत सराहनीय और अनुकरणीय है, जिसने सामूहिक प्रयासों से इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। हमें भी इसी प्रकार की सामूहिक चेतना और एकजुटता के साथ आगे बढ़ना होगा। हमारा विनम्र सुझाव है कि तमिलनाडु के अन्य क्षेत्रों की संस्थानों के सामुहिक सहयोग एवं मिलकर इस पवित्र कार्य के लिए सरकारी नियमों के अनुसार भूमि आवंटित करा सकते हैं, जिससे हमारे समुदाय को भी एक गरिमामय अंतिम आश्रय प्राप्त हो सके।
अतः यह हमारा विनम्र निवेदन है कि दक्षिण भारत में तमिलनाडु सीरवी महासभा,सहित हैदराबाद महासभा, बेंगलोर महासभा के साथ अन्य प्रांतीय महासभा को भी इस गंभीर विषय पर विचार करना चाहिए और हमारे समाज के लिए एक पृथक श्मशान घाट की व्यवस्था हेतु आवश्यक कदम उठाए, ताकि हमारे पूर्वजों को उनकी कर्मभूमि पर भी पूरे रीति-रिवाजों और सम्मान के साथ विदाई दी जा सके।
प्रस्तुति :- प्रेमाराम मुलेवा सीरवी