आज जब हम अपने सीरवी समाज को वैश्विक परिदृश्य में अन्य समाजों के साथ रखकर देखते हैं, तो यह एक गंभीर आत्म-चिंतन का विषय बन जाता है कि हम वास्तव में कहाँ खड़े हैं?। यह तुलना केवल भौतिक प्रगति की नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना, नैतिकता और सामूहिक चेतना की भी है। विश्व के कई समाजों में, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ऐसी महान सभाएँ और संगठन मौजूद हैं, जिनकी नींव निडरता और अटूट एकता पर टिकी है। उनके सदस्यों में एक विशेष प्रकार का भय, या यूँ कहें कि सम्मान, समाज के प्रति होता है। यह भय उन्हें अनुशासन में रखता है और सामूहिक हितों के प्रति उत्तरदायी बनाता है। उनकी एकता और निडरता इसी सामाजिक भय से उत्पन्न होती है, जो उन्हें सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है।
किंतु, जब हम अपने सीरवी समाज की ओर दृष्टिपात करते हैं, तो यह महसूस होता है कि यहाँ उस प्रकार के सामाजिक अनुशासन का अभाव है। ऐसा प्रतीत होता है कि सामाजिक मर्यादाओं और नैतिक मूल्यों का वह भय, जो एक स्वस्थ समाज के लिए आवश्यक है, लगभग विलुप्त हो चुका है। यही कारण है कि हमारी सामूहिक चेतना और सीरवी समाज एकता कहीं न कहीं कमजोर पड़ गई है।
आज का हमारा समाज, एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहाँ हर दिशा चमकती है, पर कोई भी राह मंजिल तक नहीं जाती। हम आधुनिकता की दौड़ में इतने मग्न हो गए हैं कि पीछे मुड़कर देखने की फुर्सत नहीं है। यह भी उतना ही कटु सत्य है कि इस भटके हुए हमारे समाज का आज कोई धणी या मार्गदर्शक नहीं रहा। एक समय था, जब समाज को दिशा देने वाले लोग हुआ करते थे—वे गुरु, संत, महात्मा, विचारक और नेता जो अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर समाज के हित के लिए जीते थे। उनका एक-एक शब्द और कर्म एक दीपक की तरह होता था, जो अंधकार में रास्ता दिखाता था। लोग उन पर विश्वास करते थे, उनकी बातों का अनुसरण करते थे, और समाज एक सूत्र में बंधा रहता था।
समाज की राष्ट्रीय महासभा, जो “अखिल भारतीय सीरवी महासभा” जिसे एकजुटता का सेतु बनना था, वह भी अपनी ही प्रांतीय संस्थाओं को जोड़ने में असफल रही है। तथा पिछले कई वर्षों से एक ही व्यक्ति कुर्सी पर आसीन है। अब वर्तमान वह एक ऐसी संस्था बन गई है, जो केवल नाम के लिए है, पर उसके भीतर वह शक्ति और संकल्प नहीं है, जो समाज को एक सूत्र में बांध सके। ऐसा प्रतीत होता है कि नेतृत्व के इस अभाव ने समाज की आत्मा को ही खोखला कर दिया है। वर्तमान समाज का हर वर्ग नेतृत्व के अभाव में छटपटा रहा है। युवा दिशाहीन हैं, बुजुर्ग अकेला महसूस कर रहे हैं, और नैतिकता के मूल्य धूमिल हो रहे हैं। सामाजिक ताना-बाना बिखर रहा है, और हम एक भीड़ में बदल रहे हैं, जहाँ हर व्यक्ति अपनी दौड़ में लगा है, बिना यह जाने कि वह कहाँ जा रहा है। इस भटकाव से मुक्ति पाना इतना भी आसान नहीं है। हमें फिर से ऐसे नेतृत्व की तलाश करनी होगी, जो निस्वार्थ भाव से समाज की सेवा कर सके हमें उस व्यक्ति को ढूंढना होगा जो केवल वादे नहीं, बल्कि दृढ़ इच्छाशक्ति और सच्चाई के साथ समाज को राह दिखा सके। जब तक ऐसा कोई धणी नहीं मिलता, तब तक यह समाज ऐसे ही चौराहे पर खड़ा रहेगा, जहाँ राहें तो कई हैं, पर दिशा कोई नहीं।
इसी मध्य विषय पर बात करें आज हमारे धर्मगुरु दीवान श्री माधव सिंह जी, जिनके मार्गदर्शन की हमें सबसे अधिक आवश्यकता है, वे भी आज मौन हैं। ओर सामाज की विभिन्न संस्थाओं को तथा समाज बंधुओं को एक नहीं कर पाए उनका मौन एक गहरी खाई बन गया है, जिसे पार कर पाना मुश्किल है। जब धर्मगुरु ही मार्ग नहीं दिखाते, तो सामान्य जन का भ्रमित होना स्वाभाविक है। आज कहने में मुझे यह शर्म नहीं आती क्योंकि कुछ अपने स्वार्थ की पूर्ति में लीन है, और इसका परिणाम यह है कि समाज टुकड़े-टुकड़े हो रहा है। हम अपनी ही जड़ें काट रहे हैं, और भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक टूटा हुआ और विभाजित समाज छोड़ रहे हैं। यह एक दुखद स्थिति है, जो एक गहन आत्म-मंथन और परिवर्तन की मांग करती है।
प्रस्तुति- नवरत्न चौधरी (पूर्व प्रधान – राणी)