सीरवी समाज के उन बंधुओं को समर्पित, जो अपनी जन्मभूमि राजस्थान को छोड़कर दक्षिण के प्रांतों में जा बसे हैं। आज हम सभी को एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। वर्षों पहले, हम एक उज्ज्वल व बेहतर भविष्य की तलाश में अपने पैतृक गाँव, अपने खेत-खलिहान और अपने प्रियजनों को छोड़कर दक्षिण भारत के विभिन्न शहरों में आकर बस गए। यह पलायन केवल भौगोलिक दूरी का नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान का भी है। इसमें कोई संदेह नहीं कि आज हमारा सीरवी समाज आर्थिक रूप से बहुत सक्षम है। हमारे बच्चों को सर्वोत्तम शिक्षा और बेहतर अवसर मिल रहे हैं। हमारे व्यापार और उद्यम खूब फल-फूल रहे हैं, किंतु इस सफलता के पीछे एक दुखद सत्य छिपा है – हम धीरे-धीरे अपनी जड़ों से कटते जा रहे हैं। आज हमारे खाली पड़े घर, हमारी उपेक्षा के मौन साक्षी हैं।
आज यह एक गंभीर चिंता का विषय है। हमारी जन्मभूमि और हमारे प्यारे गाँव आज हमें पुकार रहे हैं। जिस माटी में हमारा जन्म हुआ, जिस भूमि पर हमारे पूर्वजों ने अपने पसीने से फसलें उगाईं और जिस पर हमारी पीढ़ियों की स्मृतियां अंकित हैं, आज उसका अस्तित्व धीरे-धीरे खतरे में है। यह एक कटु सत्य है कि हम अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं। कभी चहल-पहल से भरे रहने वाले घर आज वीरान पड़े हैं। हमारी पैतृक ज़मीनें और बिना देखभाल के घर खंडहरों में तब्दील हो रहे हैं। जिस भूमि को हमारे पूर्वजों ने इतने परिश्रम से सँभाला था, आज उसे सँभालने वाला कोई नहीं है। यह केवल संपत्ति का नुकसान नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक जड़ों का क्षरण है। हमारी पहचान, हमारी परंपराएं और हमारे इतिहास का एक अभिन्न हिस्सा इन गाँवों से जुड़ा है। जब हम अपनी जड़ों से दूर होते हैं, तो हम अपनी विरासत को भी खोने लगते हैं।
आज हम अपने बच्चों को आधुनिक दुनिया के लिए तो तैयार कर रहे हैं, पर क्या हम उन्हें अपनी विरासत, अपनी संस्कृति और अपनी परंपराओं से जोड़ पा रहे हैं? उन सभी समाज बंधुओं से विनम्र आग्रह है कि जिनके परिवार का कोई सदस्य व्यापार देखने के लिए उपलब्ध है, उन्हें यह समझना चाहिए कि यह उनका नैतिक दायित्व है कि वे समय-समय पर अपने वीरान पड़े घरों और खेतों की ओर जाएँ। यह केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि अपनी जड़ों को सींचने और अपनी पहचान को जीवंत रखने का एक पुनीत प्रयास है।
हमें यह समझना होगा कि हमारी जिम्मेदारी सिर्फ अपने वर्तमान को सँवारना नहीं है, बल्कि अपने अतीत को भी सुरक्षित रखना है। हमारी आने वाली पीढ़ियां हमसे यह सवाल करेंगी कि जब हमारी जन्मभूमि खतरे में थी, तब हमने क्या किया? क्या हम उन्हें केवल खंडहर और सूनी गलियाँ ही विरासत में देंगे? यह समय है कि हम एकजुट हों और अपनी जन्मभूमि के प्रति अपने कर्तव्य को समझें। हमें अपनी जड़ों से फिर से जुड़ना होगा, अपने गाँवों का पुनर्निर्माण करना होगा और अपनी ज़मीनों को फिर से हरा-भरा बनाना होगा। यह काम सिर्फ एक या दो लोगों का नहीं, बल्कि हम सभी का सामूहिक प्रयास होना चाहिए।आज स्थिति यह है कि राजस्थान में हमारे समाज के लोगों की संख्या सिमटकर मात्र हज़ारों में रह गई है। वहाँ हमारे पैतृक घर और ज़मीन-जायदाद को सँभालने वाला कोई नहीं है। यदि हम समय रहते इस पर ध्यान नहीं देंगे, तो हमारी पहचान, हमारी धरोहर और हमारे ग्रामीण गाँवों का अस्तित्व हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा।
प्रस्तुति- रमेश सीरवी काग
सह संपादक – सीरवी समाज सम्पूर्ण भारत डाॅट काॅम