दिखावे के शोर में न बह जाए पसीने की कमाई: भव्य मंदिरों के निर्माण में आई माता की भक्ति में ‘प्रदर्शन’ नहीं, ‘परिवर्तन’ की आवश्यकता
प्रस्तुति:- डाॅ. संतोष राठौड़ धर्मपत्नी- सुरेशजी राठौड़
संस्थापक एवं मुख्य निदेशक: Bunny Teeth Advanced Dentistry, Dental
आज हम जिस संपन्नता और सम्मान के साथ सिर उठाकर जी रहे हैं, वह सब हमारी आराध्या देवी श्री आई माताजी की असीम अनुकंपा है। पर आज मेरे मन में एक पीड़ा है जो मन को झकझोर रही है, यह बात मैं अपने समाज के हर भाई-बहन के सामने रखना चाहती हूँ। राजस्थान से लेकर दक्षिण भारत तक समाज के बंधुओं द्वारा श्री आई माताजी के भव्य मंदिरों का निर्माण हो रहा हैं। जो हमारी आस्था का प्रतीक है और यह होना भी चाहिए। लेकिन प्राण-प्रतिष्ठा और वर्षगांठ जैसे आयोजनों में भजन संध्याओं में बाहरी कलाकारों पर जो करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, क्या वह सही है? हमें नहीं भूलना चाहिए कि यह पैसा हमारे समाज के भाइयों की खून-पसीने की कमाई है। जरा सोचिए, यह पैसा कहाँ से आता है? यह हमारे उन व्यापारी भाइयों की दिन-रात की मेहनत और खून-पसीने की गाढ़ी कमाई है। कई छोटे व्यापारी भाई ऐसे भी हैं, जिनके घर में तंगी है, फिर भी माताजी के प्रति एक आस्था और परिवार व समाज की लाज रखने के लिए वे अपनी मेहनत का हिस्सा ‘धूप की ओली’ के रूप में सालाना बडेर में अर्पित करते हैं। क्या उनके इस पवित्र त्याग का उपयोग केवल दिखावे के शोर में होना चाहिए?
आज दक्षिण भारत में हमने भव्य मंदिर तो खड़े कर दिए, पर विडंबना देखिए कि आज कई जगहों पर सेवा-पूजा के लिए योग्य पुजारी तक नहीं मिल रहे। *आस्था के रुप में माताजी हमारे से संगमरमर पत्थरो के बने विशाल शिखरबद्ध मंदिरों की मांग नहीं करते हैं, बल्कि वे चाहते हैं कि समाज का कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे, कोई भी बीमार व्यक्ति पैसों की कमी के कारण इलाज के अभाव में प्राण न छोड़ दे।* आज की जरूरत के हिसाब से हमारी बेटियों के पास रहने के लिए सुरक्षित छात्रावास हों और कौशल विकास केंद्रों (Skill Centers) की स्थापना हो जो आज वक्त की मांग है,जिनकी ज्यादा आवश्यकता है।
एक प्रेरणादायक उदाहरण (जोधपुर-बनाड़ रोड़ का) मेरे कुछ मित्रों ने बताया कि जो हाल ही में जोधपुर के बनाड़ रोड पर श्री आई माताजी मंदिर का प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव हुआ वो एक अद्भुत और अद्वितीय मिसाल है। वहाँ मंदिर निर्माण के साथ-साथ बालिकाओं के लिए आधुनिक छात्रावास और जोधपुर शहर में किसी कार्यवश (सरकारी या हाॅस्पिटल संबंधित या अन्य)या प्रवास गमन के दौरान आवश्यकता पड़ने पर ठहरने की उत्तम व्यवस्था भी की गई। प्रतिष्ठा महोत्सव में आयोजकों ने भारी खर्च के बजाय सादगी अपनाई और कोई फालतू दिखावा नहीं, कोई फिजूलखर्ची नहीं की। उन्होंने साबित कर दिया कि सादगी में ही असली दिव्यता है। क्या हम अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए ऐसे ही शिक्षा के मंदिर नहीं बना सकते? मैं समाज के सभी बड़े-बुजुर्गों और पदाधिकारियों से हाथ जोड़कर विनती करती हूँ— समाज के धन को ‘प्रदर्शन’ की आग में न झोंकें, बल्कि उसे ‘परिवर्तन’ की बुनियाद बनाएँ। जब समाज के अंतिम छोर पर बैठे उस गरीब भाई के बच्चे को अच्छी शिक्षा मिलेगी, तब जाकर माताजी की कृपा हम पर फलीभूत होगी।
श्री आई माता जी की सच्ची सेवा व सच्चा मंदिर वही है, जो किसी के बुझते हुए घर के चिराग को रौशन कर सके।
यह मेरी कोई शिकायत नहीं, बल्कि आपके अपने सीरवी समाज की बेटी के मन की तड़प है। यदि मेरी किसी बात से समाज के मुखियाओं व भाई-बहनों का दिल दुखा हो, तो छोटी बहन समझकर क्षमा करें।