बक्षी खुमानसिंहजी “सितारे हिन्द”

स्वर्गीय बक्षी खुमान सिंह जी का जन्म राजस्थान के अंतर्गत जोधपुर (मारवाड़) राज्य के बिलाड़ा नामक नगर में सीरवी क्षत्रिय जाति के गहलोत कुल में वैशाख सुदी 6 सवंत 1887 (तारीक 10 अप्रेल सन 1830 ई.) को हुआ था। इनके पिता का नाम खेत सिंह जी और माता का नाम जेतू भाई था खेत सिंह जी के भाइयों और उनके बीच किसी कारण वश अनबन हो जाने के हेतु सन 1834 ईस्वी में बिलाड़ा छोड़कर वे इंदौर चले गए। उस समय खुमान सिंह जी की अवस्था 4 वर्ष की थी। खेतसिंह जी के बड़े वीर और जमीन में बिना खोदे पानी बताने में पूरे दक्ष थे। इंदौर के तत्कालीन नरेश मल्हारराव होलकर ने उनकी कीर्ति पहले से किसी से सुन रखी थी, अतएव उन्होंने खेत सिंह जी को अपने पास नौकर रख लिया; और उनकी धर्मपत्नी मल्हार राव की माता महारानी कृष्णाबाई के पास रहने लगी। खुमानसिंह जी अपने माता के साथ राजभवन में जाते आते थे। और बड़े ही सुंदर स्वरूप वाले थे “होनहार बिरवान के होत चिकने पात” वाली युक्ति के अनुसार बाल्यावस्था से ही वह बड़े होनहार ज्ञात होते थे। महारानी का खुमान सिंह जी पर स्नेह हो जाने के कारण उन्होंने उनको अपने पास महल में ही रहने की आज्ञा दी। श्रीमान माननीय महाराजा तुकोजी राव दूसरे उस समय बालक अवस्था में थे। उनका खुमान सिंह जी के साथ रात दिन महल में रहने के कारण और साथ ही खेलने कूदने के कारण दोनों का आपस में खूब प्रेम हो गया। जब तुकोजीराव शिक्षा पाने के योग्य हुवे तो खुमान सिंह जी को भी उन्हीं के साथ शिक्षा दिलाने की महारानी साहिबा ने आज्ञा दे दी। तब खुमान सिंह जी राजभवन में श्रीमान माननीय महाराजा तुकोजी राव होल्कर के साथ मराठी की शिक्षा पाने लगे। जब मराठी का अध्ययन समाप्त कर चुके तो वह अंग्रेजों हिंदी और उर्दू आदि भाषाओं की भी शिक्षा पाने लगे। रायबहादुर उमेदसिंह जी आपके अध्यापक थे। इस प्रकार खुमानसिंह जी ने इंदौर के मदरसे में पंडित सरूपनारायण जी C.T.E. और राव बहादुर धर्मनारायण जी की देखरेख में महाराज तुकोजीराव के साथ अध्ययन जारी रखा। सन 1884 ईस्वी में खुमानसिंह जी को आदेश मिला कि वह घुड़सवार सेना विभाग का ब्यौरेवार विस्तृत अध्ययन करें और उसी वर्ष जून माह में 50 रुपये मासिक पर कमांडेंट बनाए गए। दूसरे वर्ष उनका वेतन बढ़ाकर 75 रुपये मासिक कर दिया गया। सन 1850 ईसवी में श्रीमान माननीय महाराज तुकोजीराव होलकर ने गुप्त भेष में उत्तरीय भारत का भ्रमण किया तब उनके साथ खुमानसिंह जी भी थे। उस समय रेलवे नहीं थी घोड़ों पर सवार होकर दस आदमियों के साथ तुकोजीराव ने यात्रा की। इस यात्रा में खुमानसिंह जी ने महाराजा साहब की बड़ी सेवाए की और मैं हमेशा के लिए महाराजा साहब के विश्वास पात्र बन गए। सन 1851 ईसवी में खुमानसिंह जी को बिजागढ़ के सूबे की सम्मान उपाधि मिली। सन 1852 ई. में श्रीमान महाराजा तुकोजीराव गद्दी पर आरूढ़ हुए और उन्हें राज्य के पूर्व अधिकार प्राप्त हुए इस अवसर पर उक्त महाराज ने सरदार लोगों को जागीरे प्रदान की। अपने बाल्यकाल में की गई अमूल्य सेवाओं के लिए 1200 रुपये वार्षिक आय का गांव सांगवी परगना बेतमा मैं खुमानसिंह जी को प्रदान किया और 250 रुपये मासिक वेतन परे बक्षीगिरी की पोशाक देकर बक्षी के पद पर नियुक्त किया यही। यही नहीं महाराजा तुकोजी राव होल्कर ने खुमानसिंह जी को पालखो, चंवरी आबदागिरी हाथी और घोड़े आदि भी प्रदान किए। कुछ समय के पश्चात महाराजा तुकोजीराव होल्कर ने एक बार फिर मुंबई की ओर यात्रा करने की तैयारी की। साथ में बक्षीखुमान सिंह जी और उनके तीन तथा चार नोकर ही थे। उस समय तक रेल नहीं आई थी महेश्वर से मुंबई यात्रा के लिए बेलगाड़ी की डाक से गए। मुंबई से पुना, पुना से नगर, नगर से नासिक आये, और वहां से सेंधिया सड़क होते हुए पुनः सवारी महेश्वरआई। इस यात्रा में भी खुमानसिंह जी ने अच्छी सेवा की। दो अथवा तीन वर्ष पश्चात महाराजा साहिब के सत्यपरामर्श एवं आज्ञा से खुमानसिंह जी ने सेना का फिर से कार्य देखना आरंभ किया और एक फौजी पाठशाला (स्कूल) की स्थापना की। जिसमें हिंदी, मराठी, उर्दू और अंग्रेजी का इनट्रेंस तक के अध्ययन का समुचित प्रबंध किया गया। सर्वसाधारण इस पाठशाला में शिक्षा पा सकता था। ऐसा कोई नियम नहीं था कि फौजी विभाग के लड़कों को ही शिक्षा दी जावे। पाठशाला का नाम मिलिट्री स्कूल रखा गया। इसके अतिरिक्त बक्षी खुमानसिंह जी ने ‘सवार रेजीमेंट’ नामक पुस्तक भी अंग्रेजी में लिखी। बक्षी खुमानसिंह जी द्वारा इंदौर में स्थापित फौजी पाठशाला के विषय में भारत सरकार के मंत्री ने निम्न सूचना प्रकाशित की थी:- सर रॉबर्ट हैमिल्टन के पत्र 1 जून सन 1855 में फौजी पाठशाला के विषय में दिए हुए ब्यौरे से ज्ञात होता है कि इस पाठशाला की स्थापना का श्रेय बक्षी खुमासिहजी को है, जिसने इस संस्था की नींव लगाई और इंदौर महाराजा को है जो इस संस्था को आंशिक रूप से सहायता देते हैं। बहुत से संतोषजनक चिन्हों में से एक यह भी है कि हमारे सीधे शासन के ताबे जनता में शिक्षा के साधनों की वृद्धि कर हम लोग देसी राज्यो की प्रजा को भी लाभ पहुंचा रहे हैं।

 

जी.एफ एडमोंस्टोन सेक्रेटरी टू गवर्नमेंट ऑफ इंडिया
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मध्य भारत के इंदौर स्थित रेजिडेंट सर आर.एन.सी. हेमिल्टन ने बक्षी साहब कृत “कैवेलरी रेगुलेशंस” पुस्तक के विषय में यह विचार प्रकट किए:- मेरे प्रिय महोदय, “नियमों के अनुवाद की पाँच प्रतियां प्राप्त कर मुझे असीम हर्ष हुआ इस काम का पूर्ण श्रेया आपकी बुद्धि और उद्यमशीलता को है; और उसकी अवश्य ही सराहना होगी मुझे यह जानकर बहुत ही हर्ष हुआ कि महाराजा के पास ऐसा स्वामी भक्त सरदार है, जो अपनी नौकरी में तल्लीन है और कितना सुयोग्य हे, जो अपने आप की प्रसिद्धि प्राप्त करना चाहता है। ईश्वर आपको पूर्ण स्वरुप रखें ताकि आपने जो कार्य भली प्रकार से आरंभ किया है उसको पूरा कर सके।”

आपका हितेषी और मित्र
सर आर.एन.सी. हैमिल्टन इंदौर 20 सितंबर 1856 ई.

श्रीमान माननीय महाराजा तुकोजी राव होल्कर के मिनिस्टर राव बहादुर उम्मेदसिंह जी अपने पत्र (तारीख 16 सितंबर सन 1856 ईसवी) में लिखते हैं:- मेरे प्यारे खुमानसिंह जी आपने जो अपने अमूल्य पुस्तक घुड़सवारों की फौजी कवायद प्रेषित की, उसका शीघ्रता से अवलोकन करने पर मुझे असीम हर्ष हुआ। ऐसी पुस्तक के गुणोंका, जो ऐसे विषय पर है जिसके विषय में मैं सर्वथा अज्ञान हूं, यद्यपि स्वयं सर्वोत्कृष्ट निर्णायक न होते हुए भी मैं अनुभव करता हूं कि आप मेरे नवयुवक मित्रों में से सबसे योग्य हो जिनकी बुद्धि का नियंत्रण करना मेरा मुख्य उद्देश्य और अध्ययन रहा है। इस पुस्तक का श्रेय निश्चय ही आपको है और निसंदेह सर रोबर्ट आप जो इन्हें प्रतियां प्रेषित कर रहे हैं, उन्हें लेकर बहुत प्रसन्न होंगे जो कि एक होनहार नवयुवक के परिश्रम का प्रथम फल है। और जो निश्चय ही तलवार चलाने मैं ही दक्ष नहीं, लेखनी चलाने में भी दक्ष होने के विषय में प्रसिद्धि प्राप्त करेगा। मैं विश्वास करता हूं कि यह ग्रंथ कहीं रचेजाने वाले ग्रंथों का अगुवा है। मैं महाराजा साहिब के फौजी विभाग को बधाई देता हूं जिसका अध्यक्ष एक ऐसा पदाधिकारी है, जो अंत में “आभूषण प्रमाणित होगा।” आपको अपने उज्जवल जीवन में हार्दिक सफलता चाहता हुआ मैं हूं-

आपका
उम्मेद सिंह गदर ओर खुमानसिंह

सन 1857 के वर्ष अंग्रेज सरकार की सेना ने अंग्रेजों के विरुद्ध गदर (बलवा) आरंभ कर दिया इंदौर की छावनी में उस समय दो कंपनियां और दो तोपे रहती थी। बलवा का होना सुनकर वह फौज भी गदर में शामिल हो गई। इस फौज के शामिल होने से श्रीमान माननीय महाराजा होल्कर की फौज का भी मन बिगड़ गया। बक्षी खुमानसिंह जी की आधीनता में जो सेना थी उसमें मुसलमान अधिक संख्या में थे। उनका महतपुर काँजेटिंट से संबंध था। मालवा फौज की टुकड़ी के सवारों ने अपने ऑफिसरों को जान से मार डाला और एकत्रित होकर दिल्ली की ओर प्रस्थान किया। इधर बक्षी साहब की अधीनता में जो सेना थी वह भी बागी होकर निकल कर भाग गई इस विकट परिस्थिति में खुमानसिंह जी ने अपनी जान की परवाह ना कर और बड़े वीरता और धैर्य से हिंदू और मुसलमानों को राजी कर उनमें एकता स्थापित की। इंदौर महाराजा ब्रिटिश सरकार के शुभचिंतक व भक्त होने के कारण बक्षीखुमान सिंह जी इंदौर महाराजा के विश्वासपात्र अधिकारी होने के कारण ब्रिटिश सरकार के पक्ष में रहे। और उन्होंने गदर की भयंकर परिस्थिति में भी धैर्य व वीरता से हिंदू मुसलमान सैनिकों में एकता का बीज बोकर उनके सहयोग से बड़े-बड़े वीरता के कार्य किए। कप्तान हचिंसन कों सपरिवार बड़ी भयंकर परिस्थिति में जान से बचाया और अममेरा के राजा तथा अन्य वागियों को पकड़कर कैद किए। बक्षी साहब के कार्य को महाराजा इंदौर के ध्यान में लाने के अभिप्राय से कप्तान ए.आर.ई हचिसन ने महू के किले से तारीख 17-7-1857 को इस आशय का पत्र लिखा था:- हम सब यहां कल 10:00 बजे आराम से पहुंच गए। खुमानसिंह ने मेरे साथ कृपा पूर्ण व्यवहार किया और मेरी सुविधा का पूरा ध्यान रखा। में श्रीमान महाराजा साहिब बहादुर के प्रति पूर्ण कृतज्ञ हूं, जिन्होंने मेरे और परिवार के लिए कृपया इतना कष्ट उठा कर कार्य किया। इस पत्र को पाकर महाराजा तुकोजी राव होल्कर बक्षी खुमानसिंह जी की वीरता पर बहुत खुश हुए और उस अवसर पर की गई बक्षीजी की सेवाओं का उल्लेख हजूरी दफ्तर के अध्यक्ष द्वारा निम्न शब्दों में किया:- “इस अवसर पर आपने जो सेवाएं की है, उसके लिए श्री दरबार साहिब आपको अत्यंत हर्ष हो रहा है, जिसकी व्यंजना करने के लिए उपयुक्त शब्द नहीं है। कप्तान हचिंसन द्वारा श्रीमान माननीय महाराजा साहिब बहादुर को प्रेषित किया गया पत्र, जो आपकी हाल ही की सेवाओं से संबंध रखता है आपके पास प्रेषित किया जाता है।”

गिरमाजी त्रिम्बक चिटनीस 16-7-1857 ई.
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कर्नल एच. एम डूरंट ऑफिशिटिंग(officiting) एजेंट टू गवर्नर जनरल फॉर सेंट्रल इंडिया ने श्रीमान माननीय महाराजा तुकोजीराव होलकर को इंदौर रेजीडेंसी से 3 अगस्त को निम्न आश्रम का पत्र बक्षीखुमान सिंह जी द्वारा की गई सेवाओं के विषय में प्रेषित किया:-  निसंदेह श्रीमान इंदौर से महू धन पहुंचाने के लिए जो कार्यवाही की उससे गवर्नर जनरल साहब प्रसन्न होंगे। इंदौर शहर के निवासी डाकुओं के हाथों में से जो धन पुनः प्राप्त किया और जिस सुयोग्यता से आप के सेनाध्यक्ष बक्षी खुमानसिंह ने कप्तान हचिंसन को खतरे से बचाया और अमभेश के मुख्य(चीफ) के सलाहकारो को पकड़ा उससे भी वे प्रशन्न होंगे।” हिज एक्सीलेंसी गवर्नर जनरल व वायसराय लॉर्ड कैनिंग ने बक्षी खुमानसिंह जी को 5000(पाँच हजार रुपए) की पारितोषिक रूप से खिलत जबलपुर के सार्वजनिक दरबार में तारीख 8 जनवरी सन 1861 को प्रदान की। गदर में की गई सेवाओं पर विचार कर महाराजा तुकोजीराव होलकर ने प्रसन्न होकर बक्षी खुमानसिंह जी को गांव सांगवी के बदले में पवारडा हापा परगना सामवेर जागीर में प्रदान किया जिस जिसकी सनद का संक्षिप्त भावानुवाद इस प्रकार है:- श्री महालसाकांत राज श्री खुमानसिंह जी व खेतसिंह जी बक्षी ठाकुर बस्तीमोजे बिलाड़ा इनको स्नेहांकित तुकोजी राव होल्कर राम राम सुरुसन सदवास सीतेन मया तेन व अलफ शके 1785 युवनाम संवत्सर नर्मदा उत्तर तीर अपने सरकार की सेवा ईमान और इतबारी से करके सरकार के निकट रह कर इतनी दिलचस्पी से की कि सरकार आप पर प्रसन्न होकर आप के कुटुंब के खर्चों के वास्ते मौजा सांगवी परगना बेटमा, यह गांव आप को शके 1773 में इनाम जागीर देकर उसके सनद बक्षी गई और उसके अनुसार आप उसका बिना हरकत उपयोग लेते हैं। संवत 1614 में जो गदर हुआ उस समय आपने सरकारी ताबेदारी बहुत होशियारी एवं ईमानदारी से बजाई। अब इस साल सांगवी ग्राम, परगना बेटमा खालसे करके वह आपको पहिले इस माफिफ् सनद बक्षी थी वह वापिस लेकर उस गांव का मुबादला मोजे पवारडा हापा परगने सामवेर यह गांव हकदार उभामार्ग एवं फौजदारी इनको वाजे करके सरकार अमल थडमोड़ एवं थल भरीत, जकात, कलाली,जल, तरू, तृण,काष्ट, पाषाण, निधि, निक्षेप के साथ इस साल से इनाम बक्षा है। और गांव के हद हदुद का चक नामा बनवाकर दिया है, और उसके बहीवाट के लिए कमाविसदार परगने सामवेर के नाम पत्र लिखकर यह सनद बक्षी जाती है। इसलिए आप मौजा पवारडा हापा, परगने समवेर को अपने कब्जे में लेकर इस गांव की आमदानी आप आपके लड़के नाती वगैर पुश्तदार और पुश्त लिया करें। सरकार की तरफ से किसी भी प्रकार की हरकत नहीं की जावेगी सो मालूम होवे। चंद्र 28 रमजान सन 1862 फसला तारीख 26 मार्च 1863, सन 1862 से 1865 ईसवी तक बक्षी साहब इंदौर के एजुकेशन बोर्ड शिक्षा समिति के सदस्य रहे हैं। सन 1970 में वह एक बहुत ही आवश्यकीय कार्य के लिए विलायत गए। और यूरुप महाद्वीप मैं घुमे। लौटते समय मिश्र देश के केरो शहर मैं भी शीघ्रता से जाकर उसे देखा। विलायत के बड़े बड़े ऑफिसरो से खुमासिह जी ने परिचय प्राप्त किया था। बीजागढ़ कई वर्षों पूर्व से ही बक्षी साहब के दो सौ रुपये (₹200) रुपये वार्षिक पर इजारे था। गदर में की सेवाओं से प्रसन्न होकर महाराजा तुकोजी राव ने बीजागढ़ के दो सौ रुपये(₹200) बक्षी साहब को सरदारी “लवाजमे” के लिए उम्र भर तक दिए जाने की आज्ञा प्रदान की। दाखल तारीख 6 अक्टूबर 1865ई. में बक्षी खुमानसिंह जी का विवाह बिलाड़ा मारवाड़ के दीवान सीरवी लक्ष्मण सिंह राठौड़ कि बहन सायबा बाई के साथ हुआ था। यह नाम बचपन का था विवाह हो जाने के पश्चात सायबा बाई की जगह दुर्गाबाई नाम रखा गया। जिसके गर्भ से 3 पुत्र और 3 कन्याएं हुई जिनका विवरण वंशवाद इसके साथ है

सवंत 1927 ईस्वी में बक्षी खुमानसिंह अपने लड़के कर्नल रामसिंह जी की शादी करने हेतु मारवाड़ आये

सन 1876 के अंत में बक्षी साहब सरनोबत (कमांडर-इन-चीफ) बनाए गए, और बाद में महाराजा तुकोजीराव होलकर के मिनिस्टर भी। वृद्धावस्था और शरीर ठीक न रहने के कारण 41 वर्षो तक इंदौर राज्य की सेवा कर सन 1861 में त्यागपत्र देकर बक्षी साहब अजमेर चले आये। यहां पर उन्होंने खुली जगह पर एक बहुत विशाल कोठी (भवन) बनाएं इसके अतिरिक्त आनासागर के तट पर एक बगीचा भी लगवाया जहां पर प्रायः सैर के लिए आया करते थे। नसीराबाद का सड़क पर भी खुमानसिंह जी ने एक बाग लगवाया था जो अभी तक सुसज्जित है। अजमेर में बक्षी साहब अपने उत्तम गुणों के कारण लोकप्रिय बन गए। अजमेर की जनता ने उनको म्युनिसिपलटी का सदस्य चुना। जब महाराजा शिवाजी राव होल्कर ने गद्दी छोड़ी तब 1866 ईस्वी में बक्शी खुमासिहजी फिर इंदौर बुलवाए गए और कॉन्सिल में फिर से भाग लेने लगे। कॉन्सिल में कई दिनों के पड़े कागजों का अपनी बुद्धिमता से निर्णय कर दिया और इंदौर राज्य की नवीन व्यवस्था कर दी। बक्षी साहब का शरीर कमजोर हो गया था, इसलिए स्टेट कॉन्सिल के बहुत दिनों के बड़े जटिल कामों की सुलाहट, फैसलों का निपटारा कर के अंत में सन 1602 ईसवी में उन्होंने त्यागपत्र देकर पेंशन ले ली। स्टेट कौंसिल ने बक्षी साहब के त्यागपत्र देने के पश्चात उनके तीन मास(3 month) का अवकाश स्वीकृत करते हुए उनके द्वारा स्टेट कॉन्सिल में किए गए महत्वपूर्ण कार्यों की प्रशंसा करते हुए लिखा:- 3 वर्षों में बक्षी खुमानसिंह सी.एस. आई (C.S.I.) ने अपना काम कितने परिश्रम से किया और इस बीच में जटिल प्रकरणों और अन्य महत्व की बातों का निर्णय किया, उनकी दी हुई सम्मति कितनी नेक एवं अमूल्य है यह कौंसिल को पूर्ण रूप से विदित है। उक्त अवकाश स्वीकार करते समय इंदौर के तत्कालीन रेजिडेंट ने बक्षी साहब द्वारा स्टेट की की गई अमूल्य सेवाओं के विषय में निम्न शब्दों में प्रशंसा की:- कौंसिल का निश्चय मुक्त पूर्ण रूप से पसंद है और बक्षी खुमानसिंह के द्वारा स्टेट कौंसिल में किए गए कार्यों के विषय में जो प्रस्ताव स्वीकार किया है, वह भी मुझे मान्य है। 54 वर्ष तक स्टेट की बड़े प्रेम और ईमानदारी के साथ सेवा कर आप अवकाश चाहते हैं यह धन्यवाद के पात्र हैं, किंतु तीन माह का का अवकाश समाप्त होने के पश्चात बक्षी साहब कौंसिल में नहीं रहेंगे, इसका मुझे हार्दिक खेद है। इंदौर राज्य की लंबी और बड़ी स्वामी भक्ति से सेवायें कर सम्वत 1968 के चैत्र सुदी 3 (तारीख 2 अप्रैल सन 1911 ईसवी) रविवार के सुबह 4:00 बजे बक्षी खुमानसिंह जी स्वर्ग सिधारे। उनकी मृत्यु की सूचना होते ही राज्य के अधिकारी एकत्रित हुए राज्य की ओर से फोजी पुरा लवाजमा, पैदल पलटन की पूरी कंपनी स्टेट केवेलरी का एक स्कवार्डन, फुल बैंड बाजा, डंका निशान, चौबदार, चपरासी आदि सब उपस्थित हुए। शव का जुलूस बड़ी धूम-धाम से नगर में से होते हुए “बक्षी बाग” में समाधि देने के लिए आया। फौज की तरफ से अंतिम सलामी दी गई शव के जुलूस में रायबहादुर नानकचन्दजी प्राइम मिनिस्टर, कुमार परमानंद जी चीफ जस्टिस, खान साहब मुशतरफा खाँ जनरल मेंबर, जनरल गोविंदराव मतकर, लाला वेशनदास जी, अकाउंटेंट जनरल, रामचंद्र जी स्टेट खजांची आदि राज्य अधिकारी थे। इनके अतिरिक्त शहर के प्रमुख सेठ साहूकार और अन्य जन समुदाय था। वह दिन बक्षी के कुटुंबीजनों और इंदौर शहर निवासियों के लिए बड़ा रंज का था।

★■ उपसंहार ■★

बक्षी खुमानसिंह जी बड़े दयालु और अपने धर्म के पक्के थे। कुल देवी नवदुर्गावतार भगवती आई माता के बड़े भक्त थे। बचपन से ही बक्षी साहब ने जन्मभूमि (बिलाड़ा) मारवाड़ छोड़ दी थी, किंतु अपने सीरवी समाज और कुलदेवी ‘आईजी’ के प्रति श्रद्धा ज्यो की त्यों बनी रहे। आईजी महाराज के नियमों का वे श्रद्धा पूर्वक पालन करते थे। उनके हाथ की ‘बेल’ (डोरा) जब कभी गल कर टूट जाती तो जब तक दूसरी ‘बेल’ धारण नहीं कर लेते, किसी से बोलते भी नहीं थे। अपने लड़के और लड़कियों की शादियां अपनी सीरवी जाति में ही कि। इतने बड़े पद पर पहुंच कर उन्होंने कभी अभिमान नहीं किया और ना जाति के रिवाज को तोड़ा। सीरवी जाति में शिक्षा की कमी देख कर मैं बहुत दुखी रहते थे। जब वे मारवाड़ में अपनी माता का मौसर (मृतक भोज) करने के लिए आए तब उन्होंने जाति के पंचों को शिक्षा का महत्व बताकर पाठशाला स्थापित करने का सोचा था। किंतु उस योजना में उन्हें सफलता नहीं मिली और यह बात उनके मन में ही रह गई। जोधपुर महाराजा ने बक्षी खुमासिहजी को कंठी और दुपट्टा सिरोपाव प्रदान किया था।

■ परिशिष्ट ■

बक्षी खुमासिहजी मारवाड़ में सीरवी जाति के एक ख्यात प्रसिद्ध पुरुष एवं इंदौर राज्य के जिम्मेदार अधिकारी थे। सम्वत 1933 में जोधपुर दरबार जोधपुर ने बिलाड़ा जाते थे तब उनको सीरोपाव ओर कंठी प्रदान की थी।

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