समाज रत्न स्वर्गीय श्री मोतीसिंहजी परिहार

किसी विद्वान ने कहा है। ‘तेजस्वी सम्मान खोजते, नही गौत्र बतला के । पाते हैं जग में प्रशस्ति, अपना करतब दिखला के। हीनमुल की ओर देख, जग गलत कहे या ठीक । कर्मवीर खींचकर ही रहते हैं, इतिहासों में लीक। सच ही है कुछ ऐसे मानव रत्न बिरले होते हैं जो स्वयं तो दुनिया से चले जाते हैं मगर उनके नाम व यश की गौरव गाथा भावी सन्तति के लिए भी आदर्श बन जाती है ऐसे ही यशस्वी रत्नों की सूची में एक नाम आता है श्री मोतीसिंहजी परिहार बिलाड़ा का । साधारण किसान परिवार में श्री चौथारामजी परिहार के घर हस्ती बाई की कोख से दिनांक 01.08.1926 को जन्मे श्री मोतीसिंहजी परिहार ने सन 1944 में 7वीं बोर्ड परीक्षा उत्तीर्ण की । आप बाल्यकाल से ही सेवाभावी थे । आपने 3 वर्ष तक राज्यकीय सेवा में पशु सहायक के रूप में कार्य किया । बिलाड़ा में सर्वप्रथम साइकिल का व्यवसाय आपने ही प्रारंभ किया । दीपक की रोशनी अर्थात् भारतीय जनसंघ के कार्यकर्ता के रूप में आपने राजनीति क्षेत्र में प्रवेश किया । जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव आये । आर्थिक स्थिति डावाडोल भी हुई लेकिन पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा । हर परिस्थिति में सदैव मुस्कुराते हुए हर बाधा का सामना करते हुए निरंतर आगे बढ़ते रहे । आपका विवाह श्रीमती तीजाबाई के संग हुआ। आपके एक पुत्र दलपत परिहार और तीन पुत्रियां कुंती, मुन्नी, सुमित्रा है । राजनीति में उच्च पायदान पर आप सन 1961 से 1964 तक ग्राम पंचायत बिलाड़ा के तीसरे सरपंच रहे । सरपंच रहते हुये आपने बिलाड़ा में आर्दश कालोनी व बालिका विद्यालय का निर्माण । बढेर चौक मे कमल रूपी अमर हुत्तात्मा स्मारक,किसान पार्क, पंचायत भवन का उद्घाटन, पुराना किला ध्वस्त कर आवासीय उपयोग हेतु सुभाष कॉलोनी का निर्माण, भाटों की ढीमड़ी का आवासीय उपयोग व बिलाड़ा नगर प्रवेश का चौथा सड़क मार्ग (बडेर चौक से नाथद्वारा मन्दिर तक), बिलाड़ा में पीने के पानी के स्त्रोतों (खारड़ा व रतन कुआ का पुननिर्माण) का निर्माण व बिलाड़ा के मध्य मोती चौक का निर्माण करवाकर विकास के पर्याय बने । बिलाड़ा क्षेत्र में भारतीय जनसंघ की स्थापना व प्रचार में प्रमुख भूमिका निभाने वाले श्री परिहार ने बाद में भारतीय जनता पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता से कार्य करते हुए प्रदेश स्तर पर अपनी पहचान बनाई और बिलाड़ा क्षेत्र में भाजपा के पितामह के रूप में ख्याति पाई । जोधपुर जिला भाजपा के आप दो बार मंत्री भी रहे । आपने जैतारण विधानसभा क्षेत्र से जनसंघ के उम्मीदवार तथा बिलाड़ा विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा । आप प्रदेश भाजपा कमेटी के सदस्य भी रहे । सन् 1990 से 1995 तक श्री परिहार बिलाड़ा नगरपालिका के अध्यक्ष भी रहे । नगरपालिका के अध्यक्ष पद पर रहते हुए आपने श्री आईजी महिला चिकित्सालय के निर्माण में महत्ती भुमिका निभाई तथा इसके भूखण्ड हेतु सर्वोच्च न्यायालय तक संघर्ष किया और भूखण्ड बिलाड़ा नगर को समर्पित किया । बिलाड़ा के सभी वार्डो में सड़को व नालियों के निर्माण के साथ नगर पालिका भवन का भी निर्माण करवाया। तथा तालाब को काटकर स्टेडियम का निर्माण करवाया। जिसका नामकरण उपराष्टृपति भैरोसिहंशेखावत द्वारा किया गया। कुशल संगठनकर्ता, स्पष्ट व प्रखर वक्ता श्री परिहार बिलाड़ा वृहत बहुधन्धी सहकारी समिति के संचालक मण्डल के सदस्य, अखिल भारतीय सीरवी महासभा के महामन्त्री, व महासभा के उपाध्यक्ष, सीरवी शिक्षा समिति बिलाड़ा के अध्यक्ष 28.08.94 से 30.08.97 तक, सीरवी समाज परगना समिति बिलाड़ा के दस वर्ष तक सचिव, सीरवी बडेरवास के 1985 से 2002 तक माननीय पंच, बिलाड़ा परगना सीरवी छात्रावास के सचिव भी रहे । आपने अपनी माताश्री का स्मृति में बडेरवास पंचायत भवन बिलाड़ा में एक कमरे का निर्माण करवाया तथा निर्माण कार्य में महत्वपूर्ण योगदान भी दिया । ढलती उम्र में भी युवाओं जैसी फुर्ती रखने वाले श्री परिहार शिक्षा व सामाजिक क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्यो के लिए सदैव स्मरणीय रहेंगे । आपने सामजिक बुराईयों के उन्मूलन व सामन्तवादी परम्परा के विरुद्ध सदैव संघर्ष किया । महान व्यक्तित्व के धनी सीरवी समाज के यशस्वी लाल श्री परिहार एक वर्ष की लम्बी बीमारी से संघर्ष करते हुये दिनांक 02.12.2001 को 75 वर्ष की आयु में इस दुनिया से हमेशा हमेशा के लिए विदा हो गये और समाज मे ऐसी रिक्तता छोड़ गये, जो कभी पुरी न हो पायेगी । बिलाड़ा की जनता आपके द्वारा करवाए गये विकास कार्यो के लिए आपकी सदैव ऋणी रहेगी । सीरवी समाज आपको प्रकाश स्तम्भ मानकर आपके महान व्यक्तित्व से सदैव प्रेरणा लेता रहेगा ।

अधिक पढ़ें

समाज रतन युग पुरुष स्व. मास्टर किशनलाल जी

समाज रतन युग पुरुष स्व. मास्टर किशनलाल जी

संक्षिप्त परिचय एवं इतिहास बींसवीं सदी में सीरवी समाज में क्रांतिकारी बदलाव लाने और समाज में नई सोच का आगाज करने वालों में मास्टर किशनलाल जी चाँदावत का नाम आज भी आदर से लिया जाता है।मास्टर किशन लाल जी चांदावत का जन्म 26 मार्च 1926 को एक साधारण किसान परिवार में हुआ था।उनके पिता पुरखाराम जी चाँदावत अपने जमाने के एक बहुत परिश्रमी किसान थे।गौरतलब है कि चाँदावत दीवान चौथोजी राठौड़ के भाई चाँदोजी के वंशज हैं।वर्तमान में चाँदावत परिवार के वंशज बिलाडा शहर के समीप स्थित पोलियावास बेरे पर निवास करते हैं।इस परिवार की एक शाखा बेरा-इकाली और दूसरी बेरा-सदारण पर निवास करती है जो कि बिलाड़ा क्षेत्र में ही स्तिथ है। मास्टर किशन लाल जी की प्रारंभिक शिक्षा उनके ननियाल ग्राम अटपडा में हुई।माध्यमिक शिक्षा हेतु उन्होंने बिलाडा बडेर परिसर में स्तिथ”सीरवी(खारड़िया)स्कूल की बोर्डिंग इकाई में दाखिला लिया।इस दौरान उन्होंने शिक्षा के प्रसार में रुचि दिखाई।तत्कालीन दीवान साहब श्री हरिसिंह जी ने सीरवी समाज में शिक्षा के प्रचार प्रसार हेतु समाज के हर घर से एक रुपये वार्षिक शुल्क का नियम लागू किया।उस दौर के समाज सेवी श्री गुमनारामजी पंवार की अगुवाई में सीरवी समाज में शिक्षा क्रांति की शुरुआत हुई। दीवान हरिसिंह जी द्वारा प्रारम्भ की गई शिक्षा क्रांति को आगे ले जाने में युवा मास्टर किशन लाल जी ने उल्लेखनीय योगदान दिया।हालाँकि पारिवारिक परिस्थितियों के कारण वह औपचारिक शिक्षा पूर्ण नही कर पाए मगर समाज में शिक्षा के प्रचार प्रसार में उन्होंने कोई कसर नही छोड़ी।उस दौर में उन्होंने घर घर जाकर युवाओं और बच्चों को पढ़ाई के लिए प्रेरित किया।आधारभूत सुविधाओं का आभाव भी उनके प्रयासों में बाधा नही बन सका।उन्होंने पेड़ की छाया में विद्यार्थियों को पढ़ाना शुरू किया।बिलाडा शहर के अंतर्गत आने वाली “पोलियावास माध्यमिक उच्च विद्यालय” उनके प्रयासों से ही वजूद में आया।गरीबी के कारण जब माँ-बाप अपने बच्चों को खेतों में मजदूरी के लिए अपने साथ ले जाते थे तब मास्टर किशन लाल ने उन्हें बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित किया।किशन लाल समाज में शिक्षा क्रांति लाने के लिए “मास्टर”के नाम से प्रसिद्ध हुए। उन्होंने केवल शिक्षा के क्षेत्र में ही नही बल्कि सीरवी समाज में व्याप्त रूढ़िवादी परम्पराओ के उन्मूलन में विशेष कार्य किया।उन्होंने 1958 में तत्कालीन बिलाडा सरपंच और महान समाज सेवी श्री तुलछाराम जी राठौड़ के साथ मिलकर “मौसर नही मौत है”नाम की पुस्तक का प्रकाशन किया।इस पुस्तक के लेखक उस समय के प्रसिद्ध राजस्थानी कवि किस्तूर चंद (पीपाड़ वाले)थे।उस दौर में सीरवी समाज में मृत्यु भोज की परंपरा प्रचलन में थी।इस परंपरा के कारण समाज में गरीबी थी।इस परंपरा को समाप्त करने के लिए मास्टर किशन लाल जी ने सफल अभियान चलाया और बहुत हद तक मृत्यु भोज(मौसर) परंपरा को रोकने में सफलता प्राप्त की। सीरवी जाती क़ा संबंध शरू से ही खेती बाड़ी से रहा है।सीरवी और किसान शब्द एक दूसरे के पर्याय थे।समाज के किसानों को उनकी उपज के उचित मूल्य दिलवाने और उनकी आर्थिक स्थित को सुदृढ करने के लिए मास्टर किशन लाल चांदावत ने संस्थाओं का विकास और विस्तार किया।सरकार द्वारा किसानों के विकास के लिए चलाई जा रही अनेक संस्थाओं में मास्टर किशन लाल ने अद्वितीय सेवाएं दी।बिलाडा ग्राम के किसानों की आर्थिक स्तिथ में सकारात्मक बदलाव लाने में उनका भरपूर योगदान रहा।समयनुसार कृषि तकनीक से किसानों को अवगत कराने के उद्देश्य से सहकारी संस्थाओं के माध्यम से किसानों के लिए “भारत भ्रमण” योजना को उन्होंने अमली जामा पहनाया। मास्टर किशन लाल चांदावत ने उस दौर में अनेक सरकारी और गैरसरकारी संस्थाओं में अपने सेवाएं दी और इन संस्थाओं का काया-कल्प कर इनको किसानों के स्वर्णगिन कास का इन्जन बनाया।इन संस्थाओं के नाम और उनके द्वारा सुशोभित पदों का विवरण निम्न दिया गया है। 1 बिलाडा सहकारी भूमी विकास बैंक अध्यक्ष-1959-1960 कोषाध्यक्ष-1963 से 1969 संचालक मंडल सदस्य-1972 से 1977 (2)बिलाडा वृहत बहुधंधी सहकारी समिति लिमिटेड पद-केंद्रीय सहकारी बैंक के प्रतिनिधि संचालक 1967-68 और 1973-1974 (3) बिलाडा मार्केटिंग कोपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड पद-अध्यक्ष 1964 से 1968- 1972 से 1978 (4)कृषि उपज मंडी समिति-बिलाडा सदस्य-1973 से 1977 (5)दी जोधपुर केंद्रीय कॉपरेटिव बैंक लिमिटिड संचालक मंडल सदस्य-1968 से 1974 (6)पंचायत समिति-बिलाडा सहयोगी सदस्य-1965 से 1967-1972 से 1974 (7)कार्यालय-नगरपालिका बिलाडा,जिल्ला-जोधपुर वार्ड पंच-1950 से 1960 –1965 से 1974 नगरपालिका मंडल सदस्य- 1974 से 1977 उन्होंने ना केवल संस्थाओं का विकास किया बल्कि बिलाडा नगर के ढांचागत विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।उन्होंने सींणवा बेरे को एक कॉलोनी में तब्दील कर सड़क का निर्माण किया और इस रोड के निर्माण से बिलाडा ग्राम से नगर बन गया।बिलाडा से गुजरने वाली सींणवा रोड का वर्ष 1990 में स्वर्गीय मास्टर किशन लाल जी की द्वितीय पुण्यतिथि के अवसर पर तत्कालीन राजस्थान सरकार में कैबिनेट मंत्री दीवान माधव सिंह जी के करकमलों द्वारा “मास्टर किशन लाल मार्ग” नामांकरण किया गया। मास्टर किशन लाल जी चाँदावत ने राजनीति के क्षेत्र में अपनी अमिट छाप छोड़ी।मास्टर किशन लाल जी चाँदावत कांग्रेस की विकासशील विचारधारा से प्रभावित थे और राजस्थान काँग्रेस के कद्दावर नेता के रूप में जाने जाते थे।सन 1979 में जब तत्कालीन जनता पार्टि सरकार ने विपक्ष की नेता श्रीमती इंदिरा गांधी को गिरफ्तार किया तो इसके विरोध में देशभर में कांग्रेस पार्टी ने जेल भरो आन्दोलन शुरू किया।मास्टर किशन लाल जी ने तब इंद्रा गांधी की गिरफ्तारी के विरोध में बिलाडा में जेल भरो आंदोलन का नेतृत्व किया। मास्टर किशन लाल जी और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती चुन्नी देवी के चार पुत्र श्री सुजान सिंह जी चांदावत,श्री रतन लाल जी चांदावत,श्री माधव सिंह जी चांदावत और श्री कल्याण सिंह जी चांदावत और दो सुपुत्रियाँ श्रीमती भंवरी देवी और श्रीमती मिश्री देवी है। मास्टर श्री किशन लाल जी चांदावत का 62 वर्ष की आयु में लंबी बीमारी के बाद 13 मई 1988 को जयपुर स्तिथ सवाई मानसिंह अस्पताल में देहांत हो गया।इस प्रकार समाज में उजाला फहलाने वाला एक चिराग हमेशा के लिए बुझ गया।आज स्वर्गीय मास्टर किशन लाल जी भले ही हमारे बीच नही है मगर उनके द्वारा समाज में किये गए क्रांतिकारी कार्यो से वह हमेशा चिरस्मरणीय रहेंगे।

अधिक पढ़ें

Recent Posts