भगवती श्री आईजी के साक्षात् दर्शन करने वाले जाणोजी राठौड़ के वंशज भक्त रोहितदास थे। रोहितदास जी का जन्म 16 वीं शताब्दी में माना जाता है। रोहितदास जी के पिता श्री का नाम कर्मसिंह जी था। कर्मसिंह जी जोधपुर के तात्कालिक महाराजा चन्द्रसेन के पक्षधर थे। अकबर ने चन्द्रसेन को पराजित करने के लिए विशाल सेना भेजी थी। अकबर की सेना का सेनापति हसन कुली खां था। कर्मसिंह जी ने चन्द्रसेन की परोक्ष सहायता के लिए मारवाड़ के समस्त कर्मठ सीरवी किसान बन्धुओं को मारवाड़ छोड़ने के लिए उकसाया। कर्मसिंह जी अपने साथियों के साथ मेवाड़ जाने की तैयारी कर रहे थे। इस घटना से क्षुब्ध होकर हसन कुली खां ने कर्मसिंह जी को धांगड़वास पाली नामक स्थान पर मार गिराया। रोहितदास जी का पालन पोषण एक विधवा सुनारी ने संथलाणा नामक स्थान पर किया। रोहितदासजी सं. 1637 माघ सुदी 5 को श्री आई माता बडेर बिलाड़ा में उपस्थित हुए। रोहितदास जी ने श्री आई माता द्वारा प्रज्ज्वलित अखंड ज्योति के सामने अनेक सालों तक एक पांव पर खड़े होकर कठोर व अखंड तपस्या की। उन्होंने अखंड ज्योति के सामने एक सांकल जड़कर देह को नाना प्रकार से सीधा खड़ा रखकर ओंकर का सतत् ध्यान किया। अंत में उन्हें भगवती श्री आईजी के साक्षात् दर्शन हुए। उन्हें कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई। रोहितदास जी एक महान संत के रूप में विख्यात हुए। वे सादा जीवन जीते थे। उन्होंने अनेक लोगों को आई पंथ के सरल भक्ति पथ से अवगत कराया। इनके समय मारवाड़, गोड़वाड़, मालवा, मेवाड़ तथा गुजरात में लाखों लोग डोराबन्ध बने। उन्होंने श्री आईजी की नीति, भक्ति तथा मुक्ति की हकीकत का प्रचार-प्रसार कर दीन-दुखियों का उपकार किया। जोधपुर तात्कालीन महाराजा गजसिंह जी को बिलाड़ा के इस संत के बारे में किसी चुगलखोर ने उल्टे-सीधे कान भर दिये। जोधपुर महाराजा ने उन्हें गिरफ्तार करवाकर जेल में डाल दिया । जनश्रुति के मुताबिक ऐसा माना जाता हे की रोहितदासजी को जेल मे डालने के बाद जेल के दरवाजे स्वतः ही खुल गये। रोहितदासजी के पावों के लिए बनाई गई बेड़ियां या तो बहुत बड़ी हो गई अथवा बहुत छोटी। उधर बिलाड़ा में रोहितदासजी के भक्तों ने रोहितदासजी को कैद करने की घटना से क्षुब्ध होकर श्री आईमाता बडेर के मुख्य द्वार के सामने करीबन 150 डोराबन्ध शहीद हो गये। इन सभी घटनाओं को सुनकर गजसिंह ने रोहितदासजी को ह्रदय से नमस्कार किया। जोधपुर महाराजा ने भगवती श्री आईजी बडेर बिलाड़ा की व्यवस्था के लिए आधा जोड़ तथा पिपलिया बेरा रोहितदासजी को भेंट किया। उन्होंने रोहितदासजी को बिलाड़ा में भगवती श्री आईजी की बडेर बनाने की मंजूरी भी प्रदान की। रोहितदासजी ने भगवती श्री आईजी की भव्य बडेर बनाई। रोहितदासजी की नजर में उंच-नीच, गरीब-श्रीमंत, स्त्री-पुरुष, साक्षर-निरक्षर आदि का कोई भेद नहीं था। वे भगवती श्री आईजी की तरह प्रवचन करते थे तथा साधकों को नाम मंत्र देते थे। वे श्री आईजी के रथ के साथ नियमित भ्रमण करते थे। भगवती श्री आईजी द्वारा स्थापित इबादत पद्धति में आध्यात्मिकता तथा सांसारिकता दोनों के समान विकास की हकीकत के दर्शन है। समाज से हटकर कोई भी इंसान आध्यात्मिक नहीं हो सकता है। माताजी ने सामाजिक व्यवस्था में साम्यवाद के सिद्धान्त को व्यावहारिक स्वरूप प्रदान किया। भगवती श्री आईजी के मन्दिर को बडेर कहा जाता है। बडेर का अर्थ है- बांडेरुओं (पूर्वजों) द्वारा स्थापित आध्यात्मिक पद्धति। बडेर में कोई एक डोराबन्ध इंसान को अन्य सभी लोग सर्वसम्मति से कोटवाल चुनते हैं। कोटवाल के दो कार्य प्रमुख होते हैं। प्रथम धार्मिक रस्मों का निर्वहन तथा द्वितीय सामाजिक एकता के लिए सामाजिकता के कार्य का जिम्मेदारी से निबटारे में सहयोग करना। इस प्रकार वह एक तरफ से राजा भी है लेकिन दूसरी तरफ से धर्म-कर्म का नोकर भी है। दूसरा व्यक्ति जमाधारी कहलाता है। जमाधारी का कार्य आध्यात्मिक अधिक व सामाजिक कम होता है। जमाधारी पद करीब-करीब परम्परागत होता है। लेकिन कोटवाल चयन प्रक्रिया से बनाया जाता है। ये दोनों इंसान बडेर की देखरेख के लिए मुकर तथा जिम्मेदार होते है। बडेर धार्मिक रस्मों के निर्वहन का स्थान तो है ही लेकिन ध्यानादि के लिए भी उत्तम स्थान होता हैं। माताजी के अनुयायियों में सर्वाधिक संख्या सीरवियों की है। सीरवियों में कोटवाल जमाधारी पद का खास महत्व है। कोटवाल-जमादारी एक तरह से पुरे समाज के प्रतिनिधि होते हैं। माताजी ने कोटवाल जमाधारी पद सूजना ब्राह्राणों के आडम्बरों तथा स्वार्थवान से बचने एवं उन्मूलन के लिए की थी। अपना एक भाई अपने को परमार्थ की नसीहत देता है, इससे इंसान की स्वस्ति बढ़ती हैं। माताजी की बडेर में हनुमानजी, चारभुजा, गजानन्दजी, दुर्गा आदि प्रतिमाएं भी स्थापित की जाती है। इस प्रकार बडेर निराकार तथा साकार के दर्शन का पावन तिर्थ स्थल होता है। || श्री आइनाथार्पनमस्मू || शुभं भवतु ||
यहां पर संक्षिप्त जानकारी लिखी गई हैं। विस्तृत अध्ययन के लिए “सीरवी समाज का उद्भव एवं विकास” नामक पुस्तक ( बिलाडा़ मंदिर में उपलब्ध है ) पुस्तक लेखक – श्री रतनलाल सीरवी (आगलेचा) एम.ए (भूगोल),बी.एड.(शिक्षक)