हमारे सीरवी समाज में श्री आईमाताजी के मन्दिर (बडेर) का निर्माण आस्था और संस्कृति के प्रतीक के रूप में होता है। हालाँकि, कहीं जगहों पर यह देखने में आया है कि इन पवित्र स्थलों पर भी एकता की कमी नजर आ रही है, तथा कुछ जगहों पर दो फाड़ देखने को मिलते हैं। तथा आपसी गुट बनाकर एक-दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयास करते है। जिससे समाज की प्रगति और शक्ति को चुनौती मिलती है। यह स्थिति समाज के लिए चिंता का विषय है, ओर इसे दूर करने के लिए हमें हर विषय को समझना होगा।
हमें अपनी शिक्षा प्रणाली को केवल पारंपरिक ज्ञान तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि इसे नैतिक और सामाजिक शिक्षा का भी केंद्र बनाना होगा। हमारे मन्दिरों को केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि ज्ञान और सामंजस्य के केंद्र के रूप में विकसित करना चाहिए। हमें इस समस्या को गंभीरता से लेना चाहिए। एकता ही हमारे समाज को मजबूत बना सकती है। अगर हम एक होकर काम करेंगे, तो हम और भी बड़ी उपलब्धियाँ हासिल कर सकते हैं। हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हर बडेर में सभी लोग मिलकर काम करें, और किसी भी तरह के मतभेद को दूर करने का प्रयास करें। कहीं ऐसा ना हो इस खींचतान में हमारे समाज में बिखराव पैदा हो जाए। और अच्छे लोग समाज सेवा से दूर हो जाए और समाज में नकारात्मकता फैलाने वाले लोग समाज को चलाएं। जो काफी जगह देखने को मिल रहा है।
*शिक्षा के माध्यम से एकता और सद्भाव*
मूल्यों पर आधारित शिक्षा: हमें युवाओं को नैतिक मूल्यों, आपसी सम्मान और सहयोग की शिक्षा देनी चाहिए। इन मूल्यों को बचपन से ही सिखाने पर वे बड़े होकर एकजुट होकर काम करेंगे और मतभेद कम होंगे।
*संवाद और बहस के मंच:* मन्दिरों को ऐसे मंचों के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए, जहाँ समाज के सभी सदस्य खुले मन से संवाद कर सकें। शिक्षा हमें यह सिखाती है कि हम तर्क और सम्मान के साथ अपनी बात कैसे रखें और दूसरों की बात कैसे सुनें।
*सामुदायिक विकास के कार्यक्रम:* मन्दिरों को शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक जागरूकता के कार्यक्रमों का आयोजन करना चाहिए। इन कार्यों में सभी वर्गों के लोगों को एक साथ मिलकर काम करने का अवसर मिलेगा, जिससे एकता की भावना मजबूत होगी।
समाज के बुजुर्गों और युवाओं को एक साथ बैठकर समस्याओं का समाधान खोजना चाहिए। शिक्षा हमें सिखाती है कि हम पुरानी परंपराओं का सम्मान करें, लेकिन साथ ही नए विचारों को भी स्वीकार करें। आपसी विश्वास और सम्मान को बढ़ावा देकर ही हम आईमाताजी के मन्दिरों को सही मायने में एकता और शिक्षा का प्रतीक बना सकते हैं।
आईमाताजी के आदर्शों पर चलकर, हमें अपने समाज में प्रेम, सद्भाव और एकता की भावना को फिर से स्थापित करना होगा। यही हमारी सच्ची भक्ति और प्रगति का मार्ग है। मन्दिरों को शिक्षा के केंद्र बनाकर हम न केवल समाज को एकजुट कर सकते हैं, बल्कि उसे नई दिशा भी दे सकते हैं।
प्रस्तुति:- वीरेंद्र पंवार
महासचिव- श्री सीरवी समाज महासभा तमिलनाडु