महान भारत भूमि की गोद में, जहाँ हर समुदाय की अपनी एक गौरवशाली गाथा है, वहाँ सीरवी समाज भी अपनी कर्मठता, संगठन और जागृति के लिए जाना जाता है। इस समाज के इतिहास की परछाइयाँ इतनी गहरी हैं कि वे हमें आज़ादी के पहले के दौर तक ले जाती हैं, जब 21 जून, 1939 को मारवाड़ सीरवी किसान सभा का गठन हुआ था। उस समय, यह केवल एक संगठन नहीं था, बल्कि एक मशाल थी जो सामाजिक समरसता और प्रगति के मार्ग को रोशन करने के लिए जलाई गई थी। इस मशाल को थामने वाले थे श्री गुमानरामजी परिहार, जिन्होंने समाज को एकजुट करने का बीड़ा उठाया।
समय का चक्र घूमता रहा। सन् 1945 में पूजनीय दीवान श्री हरीसिंहजी ने भी एक महासम्मेलन का आयोजन कर शिक्षा और विकास की अलख जगाई। ऐसा लगा कि समाज में चेतना का संचार हो रहा है, लेकिन फिर एक लंबी खामोशी ने सबको घेर लिया। यह निष्क्रियता का वह दौर था, जब समाज की गति थम-सी गई थी। पर शायद नियति को यह स्वीकार नहीं था कि एक जागरूक समाज इतनी आसानी से हार मान ले।
सन् 1971 में अखिल भारतीय सीरवी महासभा के गठन के साथ ही समाज में फिर से एक नई ऊर्जा का संचार हुआ। श्रीमान माधवसिंहजी दीवान और महामंत्री जती मोती बाबा के नेतृत्व में शिक्षा और उत्थान के प्रयासों ने फिर से उम्मीद की किरण जगाई। यह वह समय था जब समाज को एक बार फिर अपनी पहचान और दिशा मिली। परंतु, विडंबना देखिए कि यह जागृति भी अल्पकालिक सिद्ध हुई। महासभा एक बार फिर निष्क्रियता की गहरी नींद में सो गई, जैसे कोई थका हुआ यात्री अपनी मंजिल से पहले ही रुक गया हो।
फिर एक बार, 18-20 मई, 1992 को मारवाड़ जंक्शन में हुए सम्मेलन ने समाज में पुनर्जागरण का बिगुल फूंका। इस बार, महासभा का पुनर्गठन हुआ और 10 जून, 1993 को इसका विधिवत पंजीकरण भी कराया गया, ताकि इसकी जड़ें और मजबूत हो सकें। श्रीमान तेजारामजी गहलोत और महामंत्री श्री मोतीसिंहजी परिहार के नेतृत्व में इस कार्यकारिणी ने समाज को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने का काम किया। यह एक ऐसा अध्याय था जहाँ संगठन ने कार्य करके दिखाया।
इसके बाद, 27 अप्रैल, 2000 को श्रीमान नैनारामजी परिहार और श्री भूराराम जी परिहार के नेतृत्व में एक नई कार्यकारिणी का गठन हुआ। इस दौर में मध्य प्रदेश और राजस्थान के गाँवों में सामाजिक चेतना, शिक्षा और भवनों के निर्माण ने एक नई गति पकड़ी। महासभा ने अखिल भारतीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई।
परंतु, फिर वही खामोशी। 12 वर्षों का लंबा अंतराल… ऐसा लगा जैसे समय का पहिया थम गया हो। आखिर 8 मई, 2012 को पाली में हुए चुनाव में श्रीमान प्रेमप्रकाश जी चौधरी, डॉ. श्री आर. एस. चौहान और श्री भंवरलालजी चौहान के नेतृत्व में एक नई कार्यकारिणी चुनी गई। यह चुनाव एक बार फिर समाज की गहरी आशा और विश्वास का प्रतीक था।
आज, जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो यह इतिहास हमें एक महत्वपूर्ण प्रश्न के सामने खड़ा कर देता है। अखिल भारतीय सीरवी समाज की राष्ट्रीय महासभा, जिसके कंधों पर सामाजिक समरसता और न्याय का भार है, आज क्यों निष्क्रियता की चादर ओढ़े बैठी है? महासभा में पद पर आसीन हजारों चेहरों को देखकर मन में एक सवाल उठता है—क्या ये चेहरे केवल पद की शोभा हैं या फिर जिम्मेदारी का बोझ उठाने को तैयार नहीं हैं?
यह विचार शर्मिंदगी का भाव जगाता है। यदि जिम्मेदारियों का निर्वहन संभव नहीं है, तो फिर इन पदों पर निष्क्रिय होकर बैठने का क्या औचित्य है? क्या यह बेहतर नहीं होगा कि ऐसे पदों से त्यागपत्र देकर किसी कर्मठ व्यक्ति को मौका दिया जाए? आज समाज अंधकार में भटक रहा है, नेतृत्व का अभाव स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। संगठन के इतिहास में बार-बार की यह निष्क्रियता एक गहरी मौन वेदना की तरह चुभती है।
यह केवल इतिहास का बखान नहीं है, बल्कि एक आह्वान है। यह उन सभी लोगों के लिए एक दर्पण है जो आज महत्वपूर्ण पदों पर बैठकर मौन हैं। समाज को एक मजबूत और सक्रिय नेतृत्व की आवश्यकता है जो इसे दिशा दे सके, न कि केवल एक नाम के लिए बने हुए संगठन की। जब तक हम इस निष्क्रियता को त्यागकर कर्मठता का मार्ग नहीं अपनाएंगे, तब तक समाज का दीपक पूरी तरह से प्रकाशित नहीं हो पाएगा।
प्रस्तुति- भूराराम सीरवी (बर्फा ) सुमेरपुर
कोषाध्यक्ष- अखिल भारतीय सीरवी छात्रावास ट्रस्ट जयपुर