सीरवी समाज के इतिहास के पृष्ठों पर जब हम पलटते हैं, तो ‘सीरवी संदेश’ नामक एक त्रैमासिक पत्रिका का जिक्र स्वर्णिम अक्षरों में मिलता है। सन् 1975 में राजस्थान सीरवी नवयुवक मण्डल, जोधपुर के तत्वावधान में श्री प्रभुलालजी लखावत (बिलाड़ा) द्वारा एक ऐसे साहित्यिक दर्पण की नींव रखी गई, जिसका उद्देश्य समाज की चेतना को जागृत करना, उसकी संस्कृति को सहेजना और उसके विचारों को एक मंच प्रदान करना था। यह पत्रिका केवल एक प्रकाशन नहीं थी, बल्कि यह सीरवी समाज की सामूहिक आत्मा की अभिव्यक्ति थी।
प्रारंभिक वर्षों में, इस पत्रिका ने श्री राजेंद्र कुमारजी काग और वैद्य श्री पुखराजजी राठौड़ जैसे विद्वान संपादकों के नेतृत्व में कई मील के पत्थर स्थापित किए। उनके प्रयासों से पत्रिका ने न केवल निरंतरता बनाए रखी, बल्कि समाज के भीतर ज्ञान, गौरव और एकता की भावना को भी मजबूत किया। लेकिन हर यात्रा की तरह, इस साहित्यिक सफर में भी विराम आया। 1978-79 आते-आते यह त्रैमासिक पत्रिका थम-सी गई, मानो कोई जीवंत नदी अचानक सूख गई हो। फिर, एक दशक के मौन के बाद, सन् 1988 में ‘सीरवी संदेश’ ने मासिक पत्रिका के रूप में एक नई साँस ली। यह पुनर्जन्म समाज में एक नई आशा लेकर आया। यह उम्मीद थी कि जिस बौद्धिक मशाल को कुछ समय के लिए बुझा दिया गया था, वह फिर से प्रज्वलित होगी और दूर-दूर तक अपने प्रकाश को फैलाएगी। लेकिन आज, जब हम इस पत्रिका के वर्तमान को देखते हैं, तो हृदय में एक गहरी वेदना उठती है।
आज यह पत्रिका एक लंबे समय से ठप पड़ी है। जो पत्रिका कभी समाज की पहचान थी, आज स्वयं अपनी पहचान के संकट से जूझ रही है। एक सवाल जो हर संवेदनशील सीरवी के मन में उठ रहा है, वह यह है कि समाज के लाखों-करोड़ों रुपए का क्या हुआ, जो इस पत्रिका के लिए समर्पित किए गए थे? क्या यह धन किसी अंधेरी कोठरी में बंद है, जिसकी चाबी गुम हो गई है? या फिर किसी व्यक्तिगत अनदेखी और अकर्मण्यता की भेंट चढ़ गया है? यह प्रश्न केवल पैसों के हिसाब-किताब का नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज की पारदर्शिता और ईमानदारी पर भी एक सवालिया निशान है। पिछले तीन-चार वर्षो से सीरवी समाज के कई सदस्यों को सीरवी संदेश मासिक पत्रिका नहीं मिल रही है। जब पत्रिका के पाली ऑफिस से संपर्क करने पर सदस्यों को हर बार यही जवाब मिलता है कि समस्या पोस्ट ऑफिस की है और पत्रिका अगले महीने भेज दी जाएगी। यह जवाब 3/4 साल से दिया जा रहा है, जो अब सिर्फ एक बहाना लगने लगा है। यदि पोस्ट ऑफिस की समस्या है भी, तो 2/3 साल में उसका समाधान क्यों नहीं किया गया? क्या पदाधिकारियों ने इस समस्या को सुलझाने के लिए कोई ठोस कदम उठाया? क्या इस विषय को गंभीरता से लिया गया? यह केवल एक डाक संबंधी समस्या नहीं है, बल्कि यह के पत्रिका के पदाधिकारियों की जवाबदेही पर एक बड़ा सवाल है। क्या डाकघर की व्यवस्था में कोई समस्या थी, जिसने पत्रिका के वितरण को रोक दिया? या फिर यह जानबूझकर की गई अनदेखी थी, जिसकी जड़ें किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं और लापरवाह रवैये में छिपी हैं? यह विचार करना आवश्यक है कि क्या इस सामाजिक पत्रिका का मालिक बने रहना वास्तव में उचित है? क्या यह एक जिम्मेदारी है या एक ऐसा बोझ, जिसे उठाने में वर्तमान व्यवस्था सक्षम नहीं है?
जिस पत्रिका ने कभी समाज के इतिहास, संस्कृति और विकास को चित्रित किया था, आज स्वयं एक इतिहास बन कर रह गई है। यह एक ऐसी त्रासदी है जहाँ एक जीवंत संस्था धीरे-धीरे एक निर्जीव स्मारक में बदल गई है। क्या यह स्वीकार्य है कि जिस पत्रिका ने हमारे समाज की अभिव्यक्ति को स्वर दिया, आज सामाजिक पत्रिका कुछ लोगों की हाथों की कठपुतली बनकर रह गयी हैं? यह समय है जब हमें अपनी बौद्धिक और सामाजिक चेतना पर गहराई से सोचना होगा। क्या हम चुपचाप इस स्थिति को स्वीकार कर लेंगे, या फिर हम एकजुट होकर इस पत्रिका को उसके मूल उद्देश्य की ओर वापस लाएंगे? ‘सीरवी संदेश’ केवल एक पत्रिका नहीं, बल्कि यह हमारी सामूहिक पहचान, हमारी विरासत और हमारी भविष्य की आशा का प्रतीक है। इसे खो देना, हमारी अपनी ही आत्मा को खोने जैसा है।
हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि ‘सीरवी संदेश’ फिर से जीवंत हो, अपने पाठकों तक पहुँचे और समाज की समस्याओं को सामने लाए। हमें पारदर्शिता की मांग करनी होगी और यह सुनिश्चित करना होगा कि समाज का पैसा समाज के हित में ही उपयोग हो। क्या हम इस चुनौती को स्वीकार करेंगे और इस साहित्यिक दर्पण को फिर से चमकाएंगे? यह सवाल आज हर सीरवी से है।
प्रस्तुति :- मगाराम करमारामजी सीरवी (बर्फा) बिजोवा