हमारे सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जीवन में कुछ ऐसे दिन होते हैं जो मात्र तिथियाँ न होकर, एक गहरी आस्था, परंपरा और सामुदायिक एकजुटता का प्रतीक होते हैं। हमारे आई पंथ में, भादवी बीज (भाद्रपद शुक्ल द्वितीया) ऐसा ही एक पावन पर्व है, जिसे वर्तमान युवा पीढ़ी केवल एक छुट्टी के रूप में देखना हमारी समृद्ध विरासत का अनादर है। यह वह दिन है जब हम अपनी आराध्य देवी, श्री आई माताजी, के प्रति अपनी श्रद्धा और भक्ति को पुनर्जीवित करते हैं।
पुराने समय में, हमारे पूर्वजों ने इस पर्व को पूरे उत्साह और समर्पण के साथ मनाया। उनके लिए, यह सिर्फ एक अवकाश नहीं था, बल्कि एक अवसर था खेती के काम से समय निकालकर बढेर (आई माताजी का मंदिर) जाने का, जहाँ धार्मिक अनुष्ठान और सामाजिक कार्यक्रम आयोजित होते थे। विभिन्न गाँवों से लोग एकजुट होते थे, अपनी आस्था का प्रदर्शन करते थे और आपसी मेल-मिलाप को बढ़ावा देते थे। यह उनकी आस्था की गहराई और सामुदायिक जुड़ाव का प्रमाण था।
आज, जब हमारा समाज व्यापार के सिलसिले में दक्षिण भारत के कई शहरों में बस चुका है, तो हमें इस बात पर गर्व होना चाहिए कि श्री आई माताजी के मंदिर हर जगह स्थापित हैं। यह हमारे पूर्वजों के प्रयासों और आई माताजी की कृपा का फल है। हालांकि, यह दुख की बात है कि आज की पीढ़ी इन मंदिरों से दूर होती जा रही है। बहुत से युवा ऐसे हैं जिन्हें मंदिर गए हुए वर्षों बीत गए हैं। भादवी बीज उनके लिए बस एक और छुट्टी का दिन है, जिसे वे मौज-मस्ती, घूमने-फिरने और मनोरंजन के लिए इस्तेमाल करते हैं। सामाजिक संगठन और माता-पिता भले ही उन्हें मंदिर आने का निर्देश दें, युवा अपनी छुट्टियाँ बाहर बिताने को प्राथमिकता देते हैं।
भादवी बीज का वास्तविक महत्व आध्यात्मिक और सांस्कृतिक जागरूकता में निहित है। यह युवाओं के लिए एक सुनहरा अवसर है कि वे अपनी जड़ों से जुड़ें, अपने धर्म और संस्कृति को समझें और अपने समुदाय का हिस्सा बनें। यदि हम अपने बच्चों को केवल छुट्टी के दिनों में घूमने जाने की अनुमति देते हैं, तो हम अनजाने में उन्हें अपनी विरासत से दूर कर रहे हैं। मेरा उन सभी माता-पिता से विनम्र निवेदन है कि वे अपने बच्चों को भादवी बीज या अन्य महत्वपूर्ण बीज के दिनों में मंदिर अवश्य लेकर आएं।
ऐसा करने से, युवा न केवल आध्यात्मिक और धार्मिक ज्ञान प्राप्त करेंगे, बल्कि उन्हें सामाजिक संगठनों और समुदाय के कार्यक्रमों से भी परिचित होने का मौका मिलेगा। यह उन्हें समाज के साथ जोड़े रखेगा और उनके सामाजिक संबंधों को मजबूत करेगा। जब वे अपने माता-पिता और बड़े-बुजुर्गों के साथ मिलकर धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेंगे, तो वे अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करना सीखेंगे।
आज के युवाओं को यह समझना होगा कि उनकी सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखना उनका कर्तव्य है। यदि वे अपने माता-पिता और अपने धर्म के प्रति दृढ़ संकल्पित होकर वफादार रहते हैं, तो यह न केवल उनके स्वयं के लिए, बल्कि उनके परिवार और पूरे समाज के लिए भी एक सकारात्मक बदलाव लाएगा। आइए, भादवी बीज को सिर्फ एक अवकाश के रूप में न देखें, बल्कि इसे एक पवित्र त्योहार मानें, जो हमारी आस्था, हमारी संस्कृति और हमारे समुदाय को मजबूत बनाता है।
प्रस्तुति- महेंद्र सीरवी सैणचा
व्यवस्थापक यूट्यूब चैनल – सीरवी समाज संपूर्ण भारत डाॅट काॅम