आज, वर्तमान परिदृश्य में, यह विषय केवल हमारे सीरवी समाज के लिए ही नहीं, अपितु अन्य सभी समाजों के लिए भी एक विचारणीय एवं अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दा है। यह सर्वविदित है कि हमारे समाज के कई भाई-बंधु पिछले कई वर्षों से दक्षिण भारत के विभिन्न राज्यों व क्षेत्रों में निवास कर रहे हैं। इस दीर्घकालिक प्रवास के कारण, हम एक महत्वपूर्ण तथ्य की उपेक्षा कर रहे हैं। वर्तमान में, मारवाड़ में सरकार द्वारा भूमि सुधार हेतु प्रमुख योजनाएँ चला रही हैं, और केंद्र सरकार मुख्य रूप से भूमि अभिलेखों के डिजिटलीकरण एवं आधुनिकीकरण पर गहनता से ध्यान केंद्रित कर रही है। ऐसे समय में, हमें भी इस दिशा में सक्रिय विचार-विमर्श और आवश्यक कार्रवाई करनी चाहिए।
आज हमारे भावी पीढ़ी के लिए यह दुःख का विषय है कि जिस भूमि पर हमारे पूर्वजों ने खेती-बाड़ी व ‘बेरौ’ और खेतों की जमीन की देखभाल की, आज की युवा पीढ़ी—हमारे बच्चों और पौत्रों—को उसका सही स्थान और सीमा-ज्ञान तक नहीं है। यह स्थिति इसलिए उत्पन्न हुई क्योंकि हमने समय रहते इस पर ध्यान केंद्रित नहीं किया।
अक्सर गाँव व समाज में देखा गया है कि पारिवारिक और सामूहिक जमीनों को लेकर कठोर एवं जटिल विवाद सामने आते हैं। चाहे वह सामूहिक बेरों की भूमि हो या सगे भाई-भाइयों के बीच संपत्ति का बँटवारा, ऐसे अनेक प्रकार के विवाद समाज में विघटन पैदा कर रहे हैं। आज जमीनों को लेकर जो आपसी मन-मुटाव और विवाद व्याप्त हैं, उन्हीं के चलते कई बेरों पर व भाई-भाइयों के ज़मीनें का सुधार का कार्य रुका हुआ है।
एक और महत्वपूर्ण विषय देखने को मिल रहा है: अनेक स्थानों पर, हमारे पूर्वजों ने भले ही आपसी सहमति और समझदारी से ज़मीन एवं खेतों का कच्चा’ बँटवारा तो कर दिया हो, परंतु यह विभाजन सरकारी कागज़ातों (Official Records) में कई जगहों पर दर्ज नहीं है। तथा जब हमारे बीच में ज़मीनी विवाद उत्पन्न होता है, तब कोई तीसरा व बाहरी पक्ष इसका भरपूर लाभ उठाता है*, जिसके परिणामस्वरूप कई लोगों को न्यायालयों का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। हमें यह समझना होगा कि कोर्ट-कचहरी कोई स्थायी समाधान नहीं है। इन समस्याओं का एकमात्र और वास्तविक समाधान यह है कि हम आपसी सद्भाव और सौहार्द के साथ बैठकर बातचीत करें और सर्वमान्य हल निकालें। तथा इस विषय को समझते हुए, अपनी खानदानी पैतृक संपत्तियों में सुधार करवाएँ। इस सुधार प्रक्रिया को तकनीकी भाषा में जमीन तरमीम *(Land Mutation/Amendment) कहते हैं।* जमीन तरमीम (भूमि सुधार): इसका तात्पर्य भूमि के रिकॉर्ड्स, जैसे भू-नक्शा, जमाबंदी, और खसरा-खतौनी में सुधार, संशोधन, या अद्यतन (अपडेट) करना है। यह तब अनिवार्य हो जाता है जब भूमि का मालिकाना हक बदलता है, भाईयों के बीच वैधानिक बँटवारा होता है, या जमीन के विवरण में कोई भी बदलाव (जैसे नाम-परिवर्तन या सीमांकन/मेढ़बंदी) होता है। यदि समय रहते यह प्रक्रिया पूर्ण नहीं की गई, तो हो सकता है कि आपकी पुश्तैनी जमीनों का हकदार कोई और भी कहलाए।
हमारे सीरवी समाज बंधुओं से हमारा करबद्ध निवेदन है कि सभी आपसी मेल-मिलाप और सौहार्द का वातावरण बनाकर इन विवादों का तत्काल समाधान करें। अपनी विवेकशीलता और समझदारी का परिचय देते हुए, छोटे-मोटे मतभेदों को छोड़कर, अपनी आने वाली युवा पीढ़ियों के लिए इस अमूल्य धरोहर को सुरक्षित करके दीजिए। अपनी खानदानी जमीनों को सुरक्षित रखने के लिए, छोटे-मोटे विवादों को छोड़कर, सद्भावनापूर्ण समझाइश (आपसी बातचीत) के माध्यम से अपनी जमीनों को तरमीम (Land Mutation/Amendment) करवाकर उन्हें भविष्य के लिए सुरक्षित रखें। यही समय की माँग है और यही पूर्वजों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
प्रस्तुतकर्ता: मांगीलाल सोलंकी (MKJ)
सचिव: श्री सीरवी समाज, साहूकारपेट, चेन्नई
सलाहकार: श्री सीरवी समाज महासभा तमिलनाडु