संस्कार या दिखावा: किस ओर जा रहा है हमारा सीरवी समाज? इंस्टाग्राम रिल्स की चकाचौंध में कहीं खो न जाए हमारी संस्कृति और मर्यादा!
प्रस्तुति: भारती परिहारिया
संपादिका :- सीरवी समाज सम्पूर्ण भारत डाॅट काॅम’
आज यह संदेश लिखते हुए मन अत्यंत भारी है। आज हमें किसी और के बारे में नहीं, बल्कि अपने ही ‘सीरवी समाज’ के गिरते मूल्यों पर आत्म-चिंतन करने की आवश्यकता है। बात हमारी बहन-बेटियों और बहुओं की है, जो किसी भी घर की ‘इज्जत’ और ‘नींव’ होती हैं। समाज तो बाद में आता है, पर क्या आज परिवार अपनी जिम्मेदारी निभा पा रहे हैं? आज जब हम सोशल मीडिया (इंस्टाग्राम) खोलते हैं, तो अपनी ही बहू-बेटियों को सरेआम ठुमके लगाते और रील बनाते देखते हैं, तो कलेजा मुंह को आता है। दुख इस बात का नहीं है कि वे तकनीक का इस्तेमाल कर रही हैं, दुख इस बात का है कि उस वक्त उनके हाथ में मोबाइल (कैमरा) पकड़ने वाले या तो उनके मासूम बच्चे होते हैं या उनके पति। जरा सोचिए, उन मासूम बच्चे हाथों में हम क्या थमा रहे हैं? उन मासूम आंखों में हम क्या संस्कार बो रहे हैं? जो बच्चे कल समाज का भविष्य बनेंगे, वे आज अपनी माँ को मर्यादा भूलकर नाचते हुए देख रहे हैं। आज सोशल मीडिया इंस्टाग्राम पर इस झूठी लोकप्रियता और ‘लाइक’ की भूख ने कई हँसते-खेलते परिवारों को उजाड़ दिया है, रिश्तों की पवित्रता खत्म कर दी है। सबसे ज्यादा पीड़ा तब होती है जब घर के बुजुर्ग बीमार बिस्तर पर पड़े होते हैं, उनकी सेवा के लिए किसी के पास वक्त नहीं है, लेकिन इंस्टाग्राम पर रील्स बनाने के लिए घंटों उपलब्ध हैं। क्या यही हमारी संस्कृति है? क्या इसी दिन के लिए हमारे पुरखों ने समाज को सींचा था?
हमारे समाज के बड़े-बुजुर्गों की आँखों में आज आंसू हैं, वे डरे हुए हैं कि आने वाली पीढ़ी किस दिशा में जा रही है। अगर आज माता-पिता और पति अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेंगे, तो कल बहुत देर हो जाएगी। *दिखावे की इस आग में हम अपने ही घर का सुकून जला रहे हैं।* आज मेरी सभी संस्थाओं से प्रार्थना है कि सीरवी समाज के प्रत्येक राज्य की प्रांतीय महासभाओं, पदाधिकारियों और बडेरों और हर परिवार के मुखिया से—कृपया जागिए! अपनी बेटियों को केवल पढ़ाइए ही नहीं, उन्हें अपनी ‘मर्यादा’ का गहना पहनना भी सिखाइए। उन्हें बताइए कि असली पहचान चरित्र से होती है, उन्हें समझाना होगा कि उनकी असली पहचान उनकी मर्यादा और चरित्र में है, सोशल मीडिया इंस्टाग्राम पर झूठी तारीफों में नहीं।आज अन्य समाजों ने एकजुटता दिखाते हुए व अपनी मर्यादा बचाने के लिए सोशल मीडिया के दुरुपयोग पर प्रतिबंध लगाकर समाज को सही दिशा देने का सराहनीय प्रयास किया है। क्या हम सिर्फ हाथ पर हाथ धरे अपने समाज का पतन देखते रहेंगे? समय आ गया है कि हम अपनी संस्कृति को बचा लें, वरना आने वाली नस्लें हमें कभी माफ नहीं करेंगी।
प्रेषक: सीरवी समाज सम्पूर्ण भारत डाॅट काॅम