प्रस्तुति:- तेजाराम भायल ( पाली )
पूर्व संपादक :- सीरवी संदेश पत्रिका
संगठन में शक्ति है- यह कहावत हम बचपन से सुनते आ रहे हैं, लेकिन आज हमारे सीरवी समाज की वर्तमान स्थिति को देखकर यह प्रश्न पूछना आवश्यक हो गया है कि क्या हमारा ‘संगठन’ वाकई जीवित है? क्योंकि हाल ही में दक्षिण भारत के मैसूर में “पंचम अखिल भारतीय सीरवी खेल महाकुंभ” का भव्य आयोजन संपन्न हुआ। जिसमें विज्ञापनों और सूचनाओं में यह बताया गया कि यह आयोजन ‘अखिल भारतीय सीरवी महासभा’ के तत्वावधान में हो रहा है। किंतु जमीनी हकीकत को देखते हुए मन में कुछ चुभते हुए सवाल उठ रहे हैं, क्या इस आयोजन में महासभा की कोई वास्तविक और सक्रिय भूमिका थी? राष्ट्रीय महासभा और उनके वरिष्ठ पदाधिकारियों का इस आयोजन में क्या रचनात्मक सहयोग रहा? क्या हमारा केंद्रीय नेतृत्व केवल नाम मात्र के लिए है, या वह समाज के युवाओं और उनकी प्रतिभा को प्रोत्साहित करने के प्रति सजग भी है? आज मन बहुत भारी है। यह संदेश किसी की आलोचना के लिए नहीं, बल्कि हम सबके भीतर सोए हुए उस “सीरवी” को जगाने के लिए है जो कभी अपनों के दुःख में तड़प उठता था। श्री आई माताजी की असीम कृपा से आज हमारा समाज आर्थिक रूप से शिखर पर है। व्यापार, कृषि और उद्यमों में हमारी सफलता अनुकरणीय है। लेकिन क्या तिजोरियों का भरना ही समाज की प्रगति का पैमाना है? कभी हमने ठंडे दिमाग से सोचा है कि क्या हमारा ‘समाज’ भी उतना ही मजबूत हुआ है? हम व्यक्तिगत रूप से तो जीत रहे हैं, लेकिन एक ‘समाज’ के तौर पर हम पिछड़ते जा रहे हैं।
राष्ट्रीय सीरवी महासभा का गठन इस उद्देश्य से किया गया था कि पूरे भारत में फैले हमारे समाज को एक सूत्र में पिरोया जा सके। किंतु आज वास्तविकता इसके उलट दिखाई देती है। आज ऐसा लगता है जैसे उस धागे में गांठें पड़ गई हैं। बरसों से वही चेहरे, वही कुर्सियां और वही ठहराव। न कोई नया बदलाव, न कोई नई सोच। इन लोगों को पद का मोह जो वर्षों से राष्ट्रीय पदों पर आसीन है, ओर कुर्सियों से चिपके हुए हैं। जब नेतृत्व में परिवर्तन और नए विचारों का समावेश बंद हो जाता है, तो संस्थाएं ‘धणी-धोरी’ विहीन महसूस होने लगती हैं। “न हम कुछ करेंगे, न किसी को करने देंगे” की मानसिकता ने समाज के विकास की गति को अवरुद्ध कर दिया है। क्या हम इतने मजबूर हो गए हैं कि पदों पर बैठे लोगों से सवाल भी नहीं पूछ सकते? जब तक आप सवाल नहीं पूछेंगे तब तक यह गतिरोध नहीं टूटेगा। आज का दौर चमक-धमक का है। हम आधुनिकता की अंधी दौड़ में इतने मग्न हैं कि हमें पीछे मुड़कर अपने अपने समाज की व्यवस्थाओं व संस्थाओं को देखने की फुर्सत नहीं है, समाज आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहाँ रास्ते तो बहुत हैं, लेकिन सही दिशा दिखाने वाला कोई मार्गदर्शक नज़र नहीं आता। एक समय था जब हमारे गुरुओं और बुजुर्गों की एक आवाज पर पूरा समाज खड़ा हो जाता था। आज हम कई गुटों में बंट गए हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के बड़े-बड़े भंडार खुल सकते थे, अगर हमारी राष्ट्रीय संस्थाएं सक्रिय होतीं। हमारे समाज के पास धन की कमी नहीं है, बस उस धन को ‘समाज सेवा’ में बदलने वाली नीयत की कमी है। परंतु दोष केवल नेतृत्व का नहीं, हमारी चुप्पी का भी है। जब तक साधारण समाज बंधु प्रश्न पूछना बंद रखेंगे, तब तक पदों पर बैठे लोग जवाबदेह नहीं बनेंगे। हमारी यह सोच कि “मुझे समाज से क्या लेना-देना”, यह सोच हमें पतन की ओर ले जा रही है। यदि आज समाज संगठित हो और नेतृत्व सक्रिय, तो हम क्षेत्रों में क्रांति ला सकते हैं: जैसे मेधावी छात्रों के लिए छात्रवृत्ति और गंभीर बीमारियों के लिए समाज स्तर पर बीमा या अस्पताल की सुविधा। एवं युवाओं के लिए स्किल डेवलपमेंट और स्टार्टअप फंड की व्यवस्था, ओर आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को मुख्यधारा में लाना।
आज व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर ‘समाज प्रथम’ की भावना जगानी होगी। समाज के बडेरों और युवाओं को मिलकर एक नए युग का सूत्रपात करना होगा। यदि हम आज नहीं जागे और अपनी राष्ट्रीय संस्थाओं को जवाबदेह नहीं बनाया, तो आने वाली पीढ़ी हमें कभी माफ नहीं करेगी। आइए, हम सब मिलकर सीरवी समाज को केवल धनवान ही नहीं, बल्कि एक संगठित, शिक्षित और सेवाभावी समाज बनाने का संकल्प लें।