आज जब हम अपने सीरवी समाज के धार्मिक उत्सवों में उमड़ता हुआ जनसैलाब देखते हैं, तो गर्व से सीना चौड़ा हो जाता है। “आई माताजी” के जयकारों के बीच एक ही जाजम पर जब हजारों हाथ एक साथ उठते हैं, तो वह हमारी अटूट शक्ति और आस्था का जीवंत प्रमाण होता है। लेकिन, इसी भव्य दृश्य के बीच मन में एक टीस उठती है और अनेक गंभीर सवाल जन्म लेते हैं।
> मंदिर प्रांगण से बाहर ही क्यों सिमट जाती है हमारी एकता ?
> जो हाथ धर्म की ध्वजा थामने और जयकारे लगाने के लिए एक साथ उठ सकते हैं, वही हाथ समाज को न्याय दिलाने के लिए किसी सामाजिक धरना-प्रदर्शन में कंधे से कंधा मिलाने या कड़े सामाजिक सुधारों को लागू करने के समय मुट्ठियों में क्यों बंध जाते हैं ?
> ऐसी कूटनीति क्यों ? धर्म में भीड़, पर न्याय के लिए दूरी क्यों ?
> धार्मिक आयोजनों की सामूहिकता प्रशंसनीय है, लेकिन क्या हमारी एकता केवल उत्सवों तक ही सीमित रहनी चाहिए ?
> जब समाज के किसी भाई पर अन्याय होता है या समाज के हितों की रक्षा के लिए ‘हुंकार’ भरने की जरूरत होती है, तब वह जनसैलाब नजर क्यों नहीं आता ?
> हम मंदिर के प्रांगण में तो ‘एक’ हैं, लेकिन जब न्याय की लड़ाई या कुरीतियों को मिटाने हेतु कड़े फैसले लेने की बात आती है, तो हम टुकड़ों में क्यों बंट जाते हैं ?
> क्या हमारी एकता केवल दिखावे की है, या इसमें सामाजिक परिवर्तन लाने का मादा भी है ?
कराड़ी (पाली) की घटना: हमारी एकता पर एक प्रश्नचिह्न
हमारी इस सांगठनिक शिथिलता का सबसे ताजा और दर्दनाक उदाहरण हाल ही में पाली जिले के कराड़ी गांव में देखने को मिला। वहाँ समाज की एक महिला की निर्मम हत्या कर लूट की वारदात को अंजाम दिया गया। इस जघन्य अपराध के विरोध में जब न्याय की मांग हेतु धरना-प्रदर्शन और प्रशासन को ज्ञापन देने के लिए समाज का आह्वान किया गया, तो परिणाम निराशाजनक रहा। विडंबना देखिए कि जहाँ धार्मिक मेलों में पैर रखने की जगह नहीं होती, वहीं अपनी ही बहन-बेटी को न्याय दिलाने के लिए आयोजित धरने में मुट्ठी भर लोग ही पहुँचे। यह घटना हमारी उस सामूहिक चेतना पर गहरी चोट है, जिसका हम दम भरते हैं। क्या हमारी संवेदनाएं और हमारी एकजुटता केवल उत्सवों तक ही सीमित रह गई है ?
संगठन ही शक्ति है, लेकिन वह शक्ति तभी सार्थक है जब वह समाज के अंतिम व्यक्ति के संकट में काम आए। जयकारों की गूँज तब और सार्थक होगी, जब वह समाज में व्याप्त बुराइयों और अन्याय के खिलाफ भी सुनाई देगी। समाज केवल बड़े आयोजनों से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के हक के लिए लड़ने और सुधार स्वीकार करने से मजबूत बनता है।
आज अखिल भारतीय सीरवी समाज के समस्त बंधुओं को यह विचार करना होगा कि माँ आई जी की ज्योति केवल मंदिरों में ही नहीं, बल्कि हमारे विचारों में भी जलनी चाहिए। हमें यह समझना होगा कि दिखावा छोड़ें, दशा बदलें, उत्सवों में बढ़ता दिखावा युवाओं के भविष्य की नींव कमजोर कर रहा है। वह धन जो घंटों के आडंबर में व्यर्थ होता है, यदि ‘शिक्षा कोष’ में जाए, तो समाज की कई प्रतिभाएं निखर सकती हैं। शिक्षित समाज ही सशक्त समाज” है और यही आई पंथ की सच्ची राह है। युवाओं को करियर काउंसलिंग और कौशल विकास की मेज पर एक साथ बैठना होगा। जिस दिन हम कुरीतियों और अन्याय के खिलाफ वैसे ही एकजुट होकर खड़े हो गए जैसे हम धार्मिक आयोजनों के लिए होते हैं, उस दिन हमारा समाज सही मायनों में ‘शिक्षित और सशक्त’ कहलाएगा।
हमारी भक्ति केवल नारों तक न रहे, बल्कि वह समाज को बदलने वाली एक क्रांति बने। आइए, कराड़ी जैसी घटनाओं से सबक लें और संकल्प करें कि अगली बार जब समाज की अस्मिता या न्याय की बात आएगी, तो हम केवल गिने-चुने नहीं, बल्कि एक ‘सैलाब’ बनकर खड़े होंगे।
प्रस्तुति – के. प्रकाश गेहलोत सीरवी
आईजी नगर धामली नगरे
खारघर नवी मुंबई