माता की मुठ धरने के साथ गूँजने लगे गणगौर माता के गीत

 

  1. कुक्षी/मध्यप्रदेश । निमाड़ मालवा का प्रसिद्ध लोकपर्व गणगौर सोमवार को माता की मुठ धराने के साथ शुरू हो गया। श्रद्धालुओं ने माता की बाड़ी में पहुंचकर बांस की टोकरियों में गेहूं अर्पित किए।
    इन बांस की टोकरियों में गेहूं के जवारे बोए जाते हैं ,जो गणगौर तीज पर श्रद्धालु आकर्षक रथों में विराजित कर अपने घरों पर ले जाएंगे।
    भक्ति व उपासना का उत्सव एवं निमाड ,मालवा क्षैत्र का लोकपर्व गणगौर चैत्र माह की कृष्ण पक्ष की एकादशी से प्रारंभ होकर दसवें दिन विसर्जन , (बिदाई) लेने लगता है । वैसे तो यह त्योहार प्रत्येक हिन्दू घरो में मनाया जाता है,पर नगर के दशा वैष्णव पोरवाड़ समाज,पाटीदार समाज, सोनी समाज , राठौर समाज, भाम्बी समाज, माली समाज ,आदिवासी समाज आदी समाजजन भी इस पर्व को बडें ही हर्ष और उल्लास के साथ मनाते है । लेकिन क्षेत्र में रहने वाले सिर्वी समाज का यह प्रमुख पर्व होने से इसे दीपावली की तरह विशेष अंदाज में मनाया जाता है तथा समाज द्वारा इसकी महीनों पूर्व तैयारिंया आरंभ हो जाती है । दीपावली की तरह अपने घरों में सफाई , रंगाई आदि के साथ मोहल्ले को दुल्हन की तरह सजाया जाता है । जिसे निमाड़ मालवा के साथ प्रदेशभर में सराहा जाता है । यह पर्व राजा धनियार व रणुमा के गृहस्थ प्रेम एवं शिव पार्वती के पूजन आराधना से जुड़ा हुआ होकर कन्याओ के योग्य वर की प्राप्ति के लिये गौरी आराधना से जुड़ा हुआ संगीत ,कला, परंपरा तथा आस्था के अनेक रंगो का प्रतीक पर्व है ।
    मुख्य रूप से यह पर्व चैत्र शुक्ल तृतीया गौरी तीज या गणगौरी तीज से प्रारम्भ होकर तीसरे दिन पंचमी को रथ नृत्य के साथ बिदाई रूप मे समापन का रूप लेता है । ये रथ धनियर राजा व रणुबाई की प्रतीकात्मक काष्ठ प्रतिमा के होते है जिन्हें राजसी वेशभुषा पहनाकर सजाया सवारा जाता है तथा आकर्षक स्वरूप प्रदान किया जाता है ।
    चैत्र कृष्ण एकादशी को माता की बाड़ी में ज्वारे बोने के साथ गणगौर पर्व की शुरूआत होती है । इसे माता की मूठ रखना कहते है जिस स्थान पर ज्वारे बोए जाते है उसे माता की बाड़ी कहा जाता है । अलोणे कंडे यानि शुद्ध सुखा गोबर का पानी लगाए बिना बने कंडे के भूसे व खेत की मिट्टी का मिश्रण कर उसमें गेंहु बोए जाते है । इन गेंहु का अंकुरण ही ज्वारे कहलाता है । नगर में माता की मुख्य बाड़ी मंगलवारिया स्थित पुरानी धान मण्डी में पण्डित रमेंचंद्र जयदेव महाराज के यहा बोई जाती है।वर्तमान में यहा पं.कमल रावत पं.पवन रावत अपने परिजनों के साथ पैत्रक परम्परागत माताजी की बाडी बोने एवं सेवा का सौभाग्य प्राप्त कर रहे है । साथ ही नगर में दशा वैष्णव पोरवाड़ समाज की माता की बाड़ी रणछौड़राय मन्दिर में एवं गंजानन्दजी त्रिवेदी के यहॉ व भाम्बी मोहल्ले में भी माता की बाड़ी बोई जाती है । माता की बाडी के लिये जवारे अंकुरण हेतु गेहु सिर्वी समाज के प्रतिष्ठित भायल परिवार आईमाता चौक के यहॉ से प्रदान किये जाते है।
    *7 दिन तक करना पड़ती है सेवा*-
    पं.मनोहर मंडलोई ने बताया कि जो गेहूं दिए जाते हैंए उन्हें साफ कर टोकरियों में बोया जाता है। इसके लिए मिट्टी और गोबर की खाद सिर्वी समाज के विशेष सहयोग से कैलाश मोतीजी सिद्ध ,गेंदलाल सोलंकी व मोहन भुराजी सेप्टा व अन्य साथिगण द्वारा तैयार की जाती है। रोजाना सुबह शाम इन जवारों को पानी का सिंचन करना पड़ता है। जिस कक्ष में माता के जवारे बोए जाते हैंए वहां आना जाना वर्जित रहता है। गणगौर तीज पर ही यह विशेष कक्ष खोला जाता है।
    सिर्वी समाज द्वारा विशेष रुप से मनाये जाने वाले गणगौर पर्व की जानकारी देते हुए सिर्वी समाज सकल पंच कुक्षी अध्यक्ष कांतिलाल गेहलोत व पंच समिति ने बताया कि तीज के दिन अल सुबह से माता की मुख्य बाड़ी दर्शनार्थ खुलेगी जिसकी सभी परिवारो द्वारा पूजन किया जाकर 10 बजे दो सौ रथो के साथ ढोल ढमाको से माता को लेने चल समरोह पूर्वक समाजजन जायेंगे एवम गणगौर पर्व पर फुल पाती, झालरिया गीत, तथा माता की बाडी में नृत्य संगीत करना व प्रतिदीन तम्बोल ,प्रसादी, बाटना आदी क्रम सतत पर्व के दौरान चलते रहेंगे ।
    इस प्रकार प्रकृति की उपासना का यह लोकजीवन से जुडा यह लोकपर्व क्षैत्र में एक नवीन उर्जा का संचार ही नही करता अपितु उनमें प्रकृति के प्रति सामिप्य प्रदान कर जीवन में उत्साह का एक नवीन पथ दिखाता है । श्रदधा और आस्था का यह उत्सव लोकरंजन के साथ जीवन को धर्म की मुल भावना से जोडता है। उक्त धार्मिक पर्व की जानकारी कुक्षी तहसील युवा संगठन के सहप्रभारी मनोज काग ने दी

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